scorecardresearch

Muzzaffarpur News: टिशू कल्चर से तैयार किए जा रहे कीमती पौधे... राजस्थान समेत 5 राज्यों के किसान जुड़े, नौकरी छोड़ चुना किसानी का करियर

मुजफ्फरपुर में एक लीची किसान के बेटे ने नौकरी छोड़ खेती को अपना करियर बनाया है. वह टिशू कल्चर से कीमती फलों के पौधे तैयार कर रहा है. उन्होंने स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है, जिसके बाद उन्होंने नौकरी को छोड़ दिया.

Advertisement
टिशू फार्मिंग से हो रही खेती टिशू फार्मिंग से हो रही खेती

शाही लीची के लिए मशहूर मुजफ्फरपुर अब आधुनिक और कीमती फलों की खेती के लिए भी पहचान बना रहा है. यहां लीची किसान के बेटे ने नौकरी छोड़कर खेती को अपना करियर बनाया और आज टिशू कल्चर तकनीक से तैयार पौधों के जरिए खुद तो लाखों की कमाई कर ही रहे हैं, यह दूसरे राज्यों के किसानों को भी नई उम्मीद दे रहे हैं.

मुजफ्फरपुर के शिरकोहिया गांव के रहने वाले अनिल कुमार ने केमिस्ट्री से स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई की. पढ़ाई के बाद नौकरी भी की, लेकिन बचपन से कृषि को करियर बनाने का सपना था. इसी सपने ने उन्हें आधुनिक खेती की ओर खींचा.

टूशू कल्चर से उगाते हैं एवोकाडो और सीडनेस नींबू

अनिल ने टिशू कल्चर तकनीक के जरिए अंजीर, सीडलेस नींबू, अनार, एवोकाडो समेत कई कीमती फलों के पौधे तैयार करने का काम शुरू किया. उनके मुताबिक, अब तक करीब 5 हजार किसान उनसे जुड़ चुके हैं और बिहार के साथ राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक तक पौधों की सप्लाई की जा रही है. अनिल के फार्म में टिशू कल्चर से तैयार अंजीर के पौधों में अब फल भी लगने लगे हैं. उनका दावा है कि अंजीर की खेती किसानों के लिए लंबे समय तक आमदनी का जरिया बन सकती है.

कितनों के लिए टेक्नो फ्रेंडली बनने का है समय

अनिल कहते हैं कि एक समय आईटी सेक्टर था, उसी तरह आने वाले 20-30 वर्षों तक कृषि सेक्टर रहेगा. किसान को अब टेक्नो फ्रेंडली होना होगा. एक बार अंजीर का पौधा लगाइए और उसमें करीब 25 वर्षों तक फलन आ सकता है. यह किसानों के लिए काफी फायदेमंद है.

अनिल के मुताबिक, एक एकड़ में करीब 440 अंजीर के पौधे लगाए जा सकते हैं. करीब छह महीने बाद उत्पादन शुरू होने की संभावना रहती है और लगभग दो साल में पौधे पूरी क्षमता में आ सकते हैं. एक पौधे से करीब 30 किलो तक उत्पादन की संभावना बताई गई है. अंजीर के अलावा यहां ड्रैगन फ्रूट, सेब, लोगान, चीकू और स्ट्रॉबेरी समेत कई फलों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं.

पहले खुद करते हैं एक्सपेरिमेंट, फिर पौधा मिलता है किसानों को

अनिल का कहना है कि किसानों को नया पौधा देने से पहले नई किस्मों के खेत में ट्रायल किया जाता है. जब उनका ट्रायल सफल होता है, तभी बड़े स्तर पर किसानी के लिए वह पौधा किसानों को दिया जाता है. अनिल बताते हैं कि हम पहले किसी भी नई वैरायटी का ट्रायल अपने फार्म पर करते हैं. जब उसका रिजल्ट अच्छा आता है, उसके बाद किसानों को पौधे उपलब्ध कराते हैं. आज बिहार के अलावा राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक तक किसान हमसे जुड़े हैं.

केवल किसानी ही नहीं, बल्कि कीमतो फसलों की किसानी

यहां अंजीर के साथ सीडलेस नींबू, सुपर भगवा अनार और एवोकाडो जैसी फसलों पर भी काम किया जा रहा है. यानी परंपरागत खेती के बीच मुजफ्फरपुर में खेती का एक नया मॉडल तैयार हो रहा है. लीची के लिए मशहूर मुजफ्फरपुर में अब किसान नई और कीमती फसलों की तरफ भी कदम बढ़ा रहे हैं. अनिल कुमार की कहानी बताती है कि पढ़ाई और नौकरी के बाद खेती को करियर बनाकर भी युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं. उनका संदेश साफ है कि खेती अब सिर्फ परंपरा नहीं, तकनीक और कारोबार से जुड़ा भविष्य भी है.