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इस गांव में लगता है 12 घंटे का लॉकडाउन, लोग छोड़ देते हैं घर, जंगल में बसती है जिंदगी

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले नौरंगिया गांव हैजा और चेचक जैसी बीमारियों से बुरी तरह प्रभावित था. उसी समय एक सिद्ध संत ने ग्रामीणों को वनदेवी की पूजा करने और साल में एक दिन गांव खाली करने की सलाह दी थी.

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बिहार के बगहा क्षेत्र के नौरंगिया गांव में हर साल एक ऐसा दृश्य देखने को मिलता है, जो किसी को भी हैरान कर दे. सीता नवमी के दिन सूर्योदय से पहले ही गांव के लोग अपने-अपने घरों में ताले लगाकर निकल पड़ते हैं. देखते ही देखते गलियां सूनी हो जाती हैं और पूरा गांव वीरान नजर आता है. करीब 12 घंटे तक गांव में कोई नहीं रुकता, मानो जिंदगी ने कुछ देर के लिए यहां से विराम ले लिया हो.

सीता नवमी पर निभाई जाती है परंपरा
यह परंपरा बैसाख शुक्ल नवमी यानी सीता नवमी के दिन निभाई जाती है. सुबह से शाम तक सभी ग्रामीण गांव की सीमा से बाहर रहते हैं और सूर्यास्त के बाद ही वापस लौटते हैं. यह कोई औपचारिक आयोजन भर नहीं, बल्कि एक सख्त अनुशासन के साथ निभाई जाने वाली परंपरा है. ग्रामीणों का मानना है कि इस नियम का पालन करना उनके लिए बेहद जरूरी है.

महामारियों से जुड़ी है आस्था की जड़ें
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले नौरंगिया गांव हैजा और चेचक जैसी बीमारियों से बुरी तरह प्रभावित था. उसी समय एक सिद्ध संत ने ग्रामीणों को वनदेवी की पूजा करने और साल में एक दिन गांव खाली करने की सलाह दी थी. लोगों ने इसे आस्था के साथ अपनाया, और तब से यह विश्वास कायम है कि इस परंपरा ने गांव को बड़ी आपदाओं से बचाए रखा है.

नौरंगिया गांव

जंगल में पूजा और सामूहिक वनभोज
इस दिन सभी ग्रामीण पास के जंगल में स्थित भजनी कुट्टी पहुंचते हैं. यहां वनदेवी की पूजा-अर्चना की जाती है और फिर पूरा गांव एक साथ बैठकर वनभोज करता है. यह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आपसी मेल-जोल और प्रकृति के करीब आने का भी अवसर बन जाता है. बच्चे, बुजुर्ग और युवा हर कोई इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है.

नई पीढ़ी संभाल रही परंपरा की विरासत
आज के आधुनिक दौर में जहां कई परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, वहीं नौरंगिया के युवा इस विरासत को पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि उनकी पहचान का हिस्सा है. यह परंपरा गांव की एकता, विश्वास और सामूहिक शक्ति की ऐसी मिसाल पेश करती है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी जोड़कर रखती है.

रिपोर्ट- अभिषेक पांडेय

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