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LPG संकट के बीच चंदौली का एक गांव बना मिसाल, बायोगैस से जल रहे 125 घरों के चूल्हे

चंदौली जिले के नियमताबाद ब्लॉक के एकौनी गांव में करीब 150 परिवार रहते हैं. इनमें से 125 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव में लगे बायोगैस प्लांट से सुबह 3 घंटे और शाम को 3 घंटे गैस की सप्लाई दी जाती है.

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इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को एक महीने से ज्यादा समय हो चुका है. इसका असर भारत में भी देखने को मिल रहा है. खासतौर पर घरेलू एलपीजी गैस की किल्लत ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है. कई जगहों पर सिलेंडर के लिए लंबी कतारें लग रही हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का एक गांव इस संकट में भी राहत महसूस कर रहा है. यहां के लोग बायोगैस के जरिए खाना बना रहे हैं और एलपीजी की चिंता से मुक्त हैं.

125 परिवारों को रोज मिलती है गैस सप्लाई
चंदौली जिले के नियमताबाद ब्लॉक के एकौनी गांव में करीब 150 परिवार रहते हैं. इनमें से 125 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव में लगे बायोगैस प्लांट से सुबह 3 घंटे और शाम को 3 घंटे गैस की सप्लाई दी जाती है. इसी दौरान लोग अपने घरों में खाना बनाते हैं. गांव वालों का कहना है कि इस समय बायोगैस उनके लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है.

2022 में शुरू हुआ प्लांट, आज बना लाइफलाइन
इस बदलाव के पीछे गांव के ही रहने वाले चंद्र प्रकाश सिंह का हाथ है. उन्होंने 2022 में गांव में बायोगैस प्लांट लगाया था. उस समय इसे एक सामान्य सुविधा के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन आज यह पूरे गांव के लिए जीवनरेखा बन गया है. एलपीजी संकट के बीच गांव वालों को अब इसकी असली अहमियत समझ आ रही है.

biogas plant

उपभोक्ताओं ने बताया-लाइन से मिली मुक्ति
गांव की गृहणी कंचन सिंह बताती हैं कि पहले बायोगैस को सामान्य सुविधा मानते थे, लेकिन अब इसकी कीमत समझ में आ रही है. उन्हें अब गैस सिलेंडर के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता और वे अपनी सुविधा के अनुसार खाना बना पाती हैं. वहीं अखिलेश सिंह का कहना है कि बायोगैस एलपीजी के मुकाबले सस्ती और सुविधाजनक है. अगर यह सुविधा नहीं होती तो उन्हें भी बाकी लोगों की तरह संकट झेलना पड़ता.

गौशाला से निकला आइडिया, 3000 किलो गोबर का उपयोग
चंद्र प्रकाश सिंह ने भोपाल से बीटेक की पढ़ाई की, लेकिन नौकरी करने के बजाय गांव लौटकर अपने पिता की गौशाला संभालने का फैसला किया. पहले जहां गौशाला में 50 गायें थीं, वहीं अब उनकी संख्या बढ़कर 200 हो गई है. रोजाना निकलने वाले करीब 3000 किलो गोबर के बेहतर उपयोग के लिए उन्होंने बायोगैस प्लांट लगाने का निर्णय लिया.

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उन्होंने गांव वालों से इस बारे में चर्चा की, जिसे सभी ने सराहा. इसके बाद प्लांट लगाया गया और घर-घर कनेक्शन दिए गए. आज यह प्लांट न सिर्फ ईंधन दे रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रहा है.

आधी कीमत में मिल रही गैस, बढ़ी बचत
चंद्र प्रकाश के अनुसार, बायोगैस की लागत एलपीजी के मुकाबले लगभग आधी है. इससे गांव वालों की आर्थिक बचत भी हो रही है. मौजूदा हालात में जब एलपीजी की कीमत और उपलब्धता दोनों चुनौती बन गई हैं, ऐसे में यह मॉडल अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है.

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