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हादसे में गंवाया पैर, अब कृत्रिम पैर के सहारे फिर चलने लगी गोमाता

राजसमंद के घोड़ाघाटी में हाईवे पर हुई दुर्घटना में गोमाता का अगला बायां पैर बुरी तरह प्रभावित हुआ था. पैर गंवाने के बाद उसके लिए चलना-फिरना मुश्किल हो गया. ऐसे में उसकी देखभाल कर रहे लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि उसे दोबारा खड़े होने और चलने में कैसे मदद की जाए.

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हाइलाइट्स
  • कृत्रिम पैर लगने के बाद फिर अपने पैरों पर खड़ी हुई गोमाता

  • दिव्यांग गोमाता को लगाया कृत्रिम पैर

राजसमंद के घोड़ाघाटी में हाईवे पर हुए एक हादसे ने एक गोमाता को चलने-फिरने में असमर्थ कर दिया. उसका अगला बायां पैर चला गया था. वह न अपनी तकलीफ बता सकती थी और न ही किसी से मदद मांग सकती थी. लेकिन उसकी पीड़ा देखकर कुछ लोगों ने उसे दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करने की ठानी. इसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने उसके लिए कृत्रिम पैर तैयार किया. अब इस पैर की मदद से गोमाता फिर खड़ी हो पा रही है. यह कोशिश बताती है कि सही तकनीक और सेवा का भाव मिल जाए, तो किसी बेजुबान की जिंदगी भी बदल सकती है.

हाईवे हादसे में गंवाया था अगला बायां पैर
राजसमंद के घोड़ाघाटी में हाईवे पर हुई दुर्घटना में गोमाता का अगला बायां पैर बुरी तरह प्रभावित हुआ था. पैर गंवाने के बाद उसके लिए चलना-फिरना मुश्किल हो गया. ऐसे में उसकी देखभाल कर रहे लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि उसे दोबारा खड़े होने और चलने में कैसे मदद की जाए. गोमाता की हालत सामने आने के बाद समाजसेवियों और विशेषज्ञों ने उसकी मदद के लिए पहल की.

वजन और जरूरत के हिसाब से तैयार किया कृत्रिम पैर
गोमाता को राहत देने के लिए प्रोस्थेटिक्स विभाग की विशेषज्ञ टीम मौके पर पहुंची. टीम ने उसकी शारीरिक बनावट, वजन और जरूरतों का जायजा लिया. इसके बाद डॉ. मानस रंजन साहू के नेतृत्व में उसके लिए खास मॉड्यूलर कृत्रिम पैर तैयार किया गया.

इस तरह के कृत्रिम अंग को संबंधित व्यक्ति या प्राणी की जरूरत के अनुसार तैयार और फिट किया जाता है. गोमाता के मामले में भी इस बात का ध्यान रखा गया कि कृत्रिम पैर उसके शरीर के अनुकूल हो और उसे खड़े होने में मदद मिल सके.

कृत्रिम पैर फिट होते ही फिर खड़ी हुई गोमाता
कृत्रिम पैर तैयार होने के बाद विशेषज्ञों की टीम ने उसका फिटमेंट किया. यह उस गोमाता के लिए राहत का पल था, जो हादसे के बाद चलने-फिरने में असमर्थ हो गई थी. कृत्रिम पैर की मदद से वह फिर अपने पैरों पर खड़ी हो सकी. उसके लिए यह बदलाव सिर्फ चलने की कोशिश तक सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा की गतिविधियों में मदद मिलने की उम्मीद भी है. गोमाता की देखरेख और सेवा कर रहे शंकर सिंह शक्तावत का कहना है, 'इंसान अपना दर्द बोलकर बता सकता है, पर मूक प्राणियों के दर्द को महसूस करने के लिए एक संवेदनशील दिल चाहिए.'

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