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खुशबू मीठी, कहानी डरावनी... दिल्ली में किस पेड़ की खुशबू का है जादू? शैतान के पेड़ की कहानी सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे!

आज सप्तपर्णी दिल्ली की पहचान और अक्टूबर के मौसम का अहम हिस्सा है. बारिश के बाद खिलने वाले इसके फूलों की खुशबू कुछ समय तक शहर की हवा में छाई रहती है. फिर जैसे-जैसे प्रदूषण और सर्दियों की धुंध बढ़ती है, इसकी महक पीछे छूटने लगती है.

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अक्टूबर का महीना आते ही दिल्ली की हवा में एक अलग तरह की खुशबू घुलने लगती है. सड़कों पर खाने की महक हो, मसालों की खुशबू या गाड़ियों से निकलता धुआं, इन सबके बीच एक खास महक सबका ध्यान खींचती है. यह खुशबू है सप्तपर्णी के पेड़ पर खिलने वाले छोटे-छोटे फूलों की. इसकी महक इतनी तेज होती है कि कुछ लोग इसे पसंद करते हैं, तो कुछ इससे परेशान हो जाते हैं. लेकिन इस पेड़ की कहानी सिर्फ इसकी खुशबू तक सीमित नहीं है. कभी इसे रहस्यमयी आत्माओं और खूबसूरत यक्षिणियों से जोड़कर देखा जाता था. वक्त बदला, तो इसी पेड़ की पहचान पढ़ाई, परंपरा और औषधीय गुणों से भी जुड़ गई.

जंगलों से दिल्ली की सड़कों तक पहुंचा सप्तपर्णी
सप्तपर्णी का पेड़ मूल रूप से हिमालय के नम इलाकों में पाया जाता है. यह ऐसा पेड़ है, जो प्रदूषण का सामना करने की क्षमता रखता है और मुश्किल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है. शायद यही वजह है कि दिल्ली जैसे शहर में भी यह खूब फलता-फूलता है. नई दिल्ली के गोल्फ लिंक्स इलाके में 1940 के दशक के दौरान इसे बड़े पैमाने पर लगाया गया था. धीरे-धीरे यह शहर के कई हिस्सों का जाना-पहचाना पेड़ बन गया. लेकिन इसकी असली चर्चा तब शुरू होती है, जब अक्टूबर में इस पर फूल खिलते हैं. फूलों की मीठी, मसालों जैसी तेज खुशबू हवा में फैल जाती है. यह महक इतनी गहरी होती है कि कई बार लोगों को आसपास लगे पेड़ों की मौजूदगी का अंदाजा सिर्फ खुशबू से लग जाता है.

एक खूबसूरत महिला और जंगल की रहस्यमयी कहानी
सप्तपर्णी को अंग्रेजी में डेविल्स ट्री यानी शैतान का पेड़ कहा जाता है. इसके पीछे जुड़ी लोक कथाएं इसे और दिलचस्प बनाती हैं. दक्षिण भारत में प्रचलित एक कहानी के मुताबिक, यक्षिणियां सप्तपर्णी के पेड़ों पर रहती थीं. मान्यता थी कि वे कभी बेहद खूबसूरत महिलाओं का रूप लेकर लोगों को अपने आकर्षण में बांध लेती थीं. कहानी में एक ब्राह्मण देर शाम घने जंगल से गुजर रहा था. तभी सफेद कपड़े पहने एक खूबसूरत महिला ने उसे अकेले चलने से डर लगने की बात कहकर अपने घर तक साथ चलने के लिए कहा. ब्राह्मण उसके साथ जंगल के बीच बने घर पहुंचा और रात वहीं रुक गया. लोककथा के अनुसार, वह महिला एक यक्षिणी थी. ब्राह्मण उसके मोह में ऐसा डूबा कि धीरे-धीरे अपनी सेहत खोने लगा और आखिरकार उसकी मृत्यु हो गई. ऐसी कहानियों ने लंबे समय तक सप्तपर्णी को रहस्य और डर से जोड़कर रखा.

जिस पेड़ से डरते थे लोग, वही बना पढ़ाई का साथी
समय के साथ सप्तपर्णी को देखने का नजरिया भी बदला. 1950 और 1960 के दशक में भारत के कई स्कूलों में बच्चों के लिखने वाली छोटी स्लेटों के फ्रेम बनाने के लिए इसकी लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था. इसके वैज्ञानिक नाम में 'स्कॉलरिस' शब्द भी शिक्षा से जुड़े इसी महत्व की याद दिलाता है. इस पेड़ का सम्मान साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी एक परंपरा में भी दिखाई देता है. विश्व भारती विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह के दौरान विद्यार्थियों को सप्तपर्णी की पत्तियां देने की परंपरा शुरू की गई. इस तरह कभी रहस्यमयी कहानियों में पहचाना जाने वाला पेड़ शिक्षा और सम्मान का प्रतीक भी बन गया.

खुशबू के साथ बदलते मौसम का संदेश
आज सप्तपर्णी दिल्ली की पहचान और अक्टूबर के मौसम का अहम हिस्सा है. बारिश के बाद खिलने वाले इसके फूलों की खुशबू कुछ समय तक शहर की हवा में छाई रहती है. फिर जैसे-जैसे प्रदूषण और सर्दियों की धुंध बढ़ती है, इसकी महक पीछे छूटने लगती है. यही इसकी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है. एक ही पेड़ कभी डर और रहस्य का प्रतीक बना, फिर पढ़ाई और परंपरा से जुड़ा और आज दिल्ली में बदलते मौसम की पहचान बन गया है.

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