
ओडिशा के आदिवासी समुदायों में जड़ें जमाए ‘धान मूर्ति’ कला आज परंपरा, स्थिरता और कला का अनोखा संगम बनकर उभर रही है. यह प्राचीन शिल्पकला है जो सूखे धान के छिलकों से तैयार की जाती है. यह ओडिशा की कृषि विरासत और लोगों की धरती से जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है.
धान से बनती हैं मूर्तियां, सजावट और कलात्मक शिल्प
आगे बढ़ा रहे पारंपरिक कला
कोरापुट जिले के कारीगर बलराम नायक इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं. वे बताते हैं, "हमारे परिवार में यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है. पिता के निधन के बाद हमने इसे और गंभीरता से अपनाया. पूरा परिवार इसमें शामिल है. हम धान, बांस और कपास का उपयोग करते हैं."
बलराम नायक ने अपनी कृतियों की मुंबई, पुणे और दिल्ली जैसी जगहों पर प्रदर्शनियां भी लगाई हैं. उनके शिल्प की कीमत 800 रुपये से शुरू होती है, जो डिजाइन के अनुसार और भी ज्यादा हो सकती है.
सरकारी सहयोग की दरकार
बलराम नायक का कहना है, "इस कला को बचाने और दुनिया तक पहुंचाने के लिए हमें सरकार से सहयोग की जरूरत है. अगर सही मदद मिले, तो यह कला अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना सकती है."
जैसे-जैसे सस्टेनेबल लिविंग यानी पर्यावरण-हितैषी जीवनशैली की जागरूकता बढ़ रही है, धान मूर्ति कला को देश-विदेश में लोकप्रियता मिल रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संस्थानिक समर्थन, सरकारी फंडिंग और मंच मिलें, तो यह कला ओडिशा की विरासत को वैश्विक पहचान दिला सकती है.
(अजय झा की रिपोर्ट)
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