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Ganesh Chaturthi: दुनिया में पहचान बना रही है धान की मूर्तिकला...कारीगरों की अनोखी परंपरा

यह प्राचीन शिल्पकला है जो सूखे धान के छिलकों से तैयार की जाती है. यह ओडिशा की कृषि विरासत और लोगों की धरती से जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है.

धान की मूर्तिकला धान की मूर्तिकला

ओडिशा के आदिवासी समुदायों में जड़ें जमाए ‘धान मूर्ति’ कला आज परंपरा, स्थिरता और कला का अनोखा संगम बनकर उभर रही है. यह प्राचीन शिल्पकला है जो सूखे धान के छिलकों से तैयार की जाती है. यह ओडिशा की कृषि विरासत और लोगों की धरती से जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है.

धान से बनती हैं मूर्तियां, सजावट और कलात्मक शिल्प

  • धान मूर्ति कला में धान के सूखे छिलकों को चुनकर, साफ करके और कभी-कभी प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है.
  • इसके बाद, धागे, सुई और गोंद की मदद से कारीगर इन्हें बारीकी से जोड़ते हैं.
  • इस प्रक्रिया में तैयार होती हैं खूबसूरत मूर्तियां, सजावटी वस्तुएं, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और अन्य कलात्मक शिल्प.
  • इनमें प्रकृति, लोककथाओं और धार्मिक आस्थाओं की झलक मिलती है.
  • त्योहारों के दौरान, खासकर गणेश चतुर्थी पर, इन धान की मूर्तियों की शहरी और ग्रामीण बाजारों में भारी मांग रहती है.

आगे बढ़ा रहे पारंपरिक कला 
कोरापुट जिले के कारीगर बलराम नायक इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं. वे बताते हैं, "हमारे परिवार में यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है. पिता के निधन के बाद हमने इसे और गंभीरता से अपनाया. पूरा परिवार इसमें शामिल है. हम धान, बांस और कपास का उपयोग करते हैं."

बलराम नायक ने अपनी कृतियों की मुंबई, पुणे और दिल्ली जैसी जगहों पर प्रदर्शनियां भी लगाई हैं. उनके शिल्प की कीमत 800 रुपये से शुरू होती है, जो डिजाइन के अनुसार और भी ज्यादा हो सकती है.

सरकारी सहयोग की दरकार
बलराम नायक का कहना है, "इस कला को बचाने और दुनिया तक पहुंचाने के लिए हमें सरकार से सहयोग की जरूरत है. अगर सही मदद मिले, तो यह कला अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना सकती है."

जैसे-जैसे सस्टेनेबल लिविंग यानी पर्यावरण-हितैषी जीवनशैली की जागरूकता बढ़ रही है, धान मूर्ति कला को देश-विदेश में लोकप्रियता मिल रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संस्थानिक समर्थन, सरकारी फंडिंग और मंच मिलें, तो यह कला ओडिशा की विरासत को वैश्विक पहचान दिला सकती है.

(अजय झा की रिपोर्ट)

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