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History of Kachori: मोगर से लेकर बनारसी कचौड़ी तक, दुनियाभर में खाई जाती है मारवाड़ियों की बनाई कचौड़ियां, देशभर में मिलेंगे अलग-अलग रूप

भारत में स्नैक्स की बात हो और समोसे-कचौड़ी का नाम न लिया जाए, ऐसा कैसे हो सकता है. हल्के स्नैक्स से लेकर स्पेशल ट्रीट तक, कचौड़ी कई तरह के रोल निभाती है. इसलिए आज दस्तरखान में जानिए कचौड़ी के इतिहास के बारे में.

History of Kachori History of Kachori

भारतीय उपमहाद्वीप कई चीज़ों के लिए प्रसिद्ध है, उनमें से एक है स्वाद पैलेट और पाक शैली में विविधता. कहते हैं कि भारत का व्यंजन हर 100 किलोमीटर पर बदल जाता है, यानी, अगर आप एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा करते हैं, तो एक ही डिश के अलग रूप आपको खाने को मिलेंगे. और इन व्यंजनों में सबसे कॉमन है कचौड़ी (Kachori). जी हां, कचौड़ी का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और इसलिए यह भारत के फेवरेट स्नैक्स में से एक है. 

कचौड़ी जितनी स्वाद होती है, उतना ही पुराना इतिहास है इसका. समय के साथ और स्थान के अनुरूप कचौड़ी का स्वाद और बनाने का तरीका बहुत बदला है. लेकिन कुछ नहीं बदला तो वह है इसके प्रति भारतीयों का प्रेम जो अब विदेशों तक भी पहुंच रहा है. आज दस्तरखान में हम आपको बता रहे हैं कचौड़ी की कहानी. 

मारवाड़ियों की देन है कचौड़ी 
ऐसा कहा जाता है कि मारवाड़ी लोगों (मारवाड़ क्षेत्र के) को कचौड़ी ईजाद करने का श्रेय जाता है. व्यापार के लिए इधर-उधर जाने वाले लोगों ने इसे बनाना शुरू किया. मारवाड़ियों की पीढ़ियां व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए व्यापार करने के लिए जानी जाती हैं. ऐसा माना जाता है कि जब वे दूर-दराज के इलाकों की यात्रा करते थे, तो वे अक्सर स्थानीय लोगों के साथ भोजन के प्रति अपने प्यार बांटते थे. इस तरह उनके आविष्कारों में से एक कचौड़ी को अब पूरा देश जानता है. समय के साथ कचौरी के भी विभिन्न रूप खोजे गए जो अब विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध हैं. 

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प्राचीन व्यापार मार्ग हमेशा मारवाड़ से होकर गुजरते थे और मारवाड़ियों को हमेशा अपने क्षेत्र से गुजरने वाली सर्वोत्तम उपज मिलती थी. मारवाड़ी शाकाहारी हैं, और वे सीमित स्थानीय उपज के साथ भी अपने भोजन को मसालेदार बनाना जानते हैं. रेगिस्तान में कचौड़ी में मसाले होते हैं जिन्हें आमतौर पर 'ठंडा मसाला' के रूप में जाना जाता है. ठंडा मसाला में मूल रूप से धनिया और सौंफ़ के साथ-साथ हल्दी भी होती है, जो इन कचौरियों को जलवायु के लिए उपयुक्त बनाती है. 

कचौड़ियों के अलग-अलग रूप 
मारवाड़ी कचौड़ी सबसे अच्छा उदाहरण जोधपुर की मोगर कचौड़ी है जिसमें किसी भी ताजा चीज का उपयोग नहीं होता है और इसे साल में किसी भी समय रेगिस्तान में बनाया जा सकता है. इसमें छिलके वाली मूंग दाल का पेस्ट भरा जाता है और स्थानीय मसालों और खटास के साथ मिलाया जाता है. मैदे को इस तरह से गूंधा जाता है कि लगभग आधे घंटे तक धीमी आंच पर तलने पर यह परतदार हो जाती है. 

जोधपुर में मावा कचौड़ी बनती है, जो अक्सर चांदी के वर्क से ढकी होती है. यहां तक ​​कि पूरे राजस्थान, मध्य प्रदेश और यूपी के कुछ हिस्सों में बनाई जाने वाली प्याज़ कचौड़ी भी ऐसी सामग्रियों से बनाई जाती है जो मौसम पर निर्भर नहीं होती हैं. उत्तर से हींग कचौरी बंगाल तक भी पहुंची है. उड़द दाल से भरी हींग कचौरी को आम तौर पर करी के साथ परोसा जाता है जो भौगोलिक स्थिति के आधार पर आलू या कद्दू आधारित हो सकती है. उड़द दाल की भरवां कचौड़ी का एक रूप पश्चिमी यूपी और दिल्ली के कुछ हिस्सों में बेड़मी पूरी के तौर पर बनाया जाता है. बेड़मी पूरी मैदे से नहीं बल्कि मोटे आटे से बनाई जाती है.

बनारस की कचौड़ी गली है वर्ल्ड में फेमस
बात बनारसी कचौड़ी की करें तो अब यहां की कचौड़ी गली वर्ल्ड फेमस है. बनारस की कचौड़ी नरम होती है, इसे पूरे गेहूं के आटे से और बहुत कम स्टफिंग के साथ बनाया जाता है, और सब्जी बहुत अच्छी तरह से बनाई जाती है. आपको बनारसी कचौरी की सब्ज़ी में पालक, कद्दू, परवल और यहां तक कि बैंगन जैसी मौसमी सब्जियां भी मिलेंगी, जिनमें कभी-कभी मटर या काले चने भी अच्छी मात्रा में डाले जाते हैं. वहीं, नागोरी कचौड़ी में स्टफिंग नहीं होती है, यह हल्की नमकीन होती है, बहुत कुरकुरा होती है और इसे मीठे हलवे के साथ परोसा जाता है. 

महाराष्ट्र की शेगांव कचौड़ी बीकानेर की मोगर कचौरी की चचेरी बहन है, लेकिन इसने अपने लिए एक अलग जगह बना ली है क्योंकि इसे अनोखे तरीके से परोसा जाता है. बंगाल की स्वादिष्ट मटर कचौड़ी आलू दम के साथ एक स्वादिष्ट व्यंजन है. बिहार की सत्तू कचौड़ी, जिसे ज्यादातर चटनी और चोखा के साथ परोसा जाता है, लिट्टी से बनाई जाती है. 

लिलवा कचौरी का नाम अरहर या लिलवा से लिया गया है, जो सर्दियों में थोड़े समय के लिए बाजार में आती है. गुजराती लोग लिलवा कचौड़ी और लिलवा ना घुघरा बनाते हैं. लिलवा ना घुघरा एक स्वादिष्ट अर्धचंद्राकार कचौड़ी है. हालांकि, राज कचौड़ी के बिना कचौड़ियों की बात अधूरी है. यह फूले हुए गोल गप्पे जैसी दिखती है. इसमें विभिन्न प्रकार की चाट सामग्री होती है. राज कचौड़ी की उत्पत्ति बीकानेर में हुई थी.