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19 सालों से घायल पक्षियों को बचाने का काम कर रहे हैं दो भाई...डॉक्यूमेंट्री फिल्म का भी रह चुके हैं हिस्सा

लगभग 19 साल पहले नदीम शहजाद और मुहम्मद सऊद ने उत्तरी दिल्ली में अपने पुश्तैनी घर के पास चावड़ी बाजार की सड़कों पर एक ब्लैक काइट को बचाया था. एक चील को बचाने के बाद से लेकर आज तक दिल्ली में रहने वाले दोनों भाई पक्षियों को बचाने का काम कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने 23,000 से अधिक पक्षियों का इलाज किया, जिनमें ज्यादातर शिकारी पक्षी थे. इसके अलावा वजीराबाद में इन्होंने पक्षियों के लिए एक बचाव केंद्र भी बनवाया है.

Representative Image  (PC: Unsplash) Representative Image (PC: Unsplash)
हाइलाइट्स
  • रिपोर्ट छपने के बाद लोगों ने की मदद

  • डॉक्यूमेंट्री को मिला ग्लोबल पहचान

लगभग 19 साल पहले नदीम शहजाद और मुहम्मद सऊद ने उत्तरी दिल्ली में अपने पुश्तैनी घर के पास चावड़ी बाजार की सड़कों पर एक ब्लैक काइट को बचाया था. एक चील को बचाने के बाद से लेकर आज तक दिल्ली में रहने वाले दोनों भाई पक्षियों को बचाने का काम कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने 23,000 से अधिक पक्षियों का इलाज किया, जिनमें ज्यादातर  शिकारी पक्षी थे. इसके अलावा वजीराबाद में इन्होंने पक्षियों के लिए एक बचाव केंद्र भी बनवाया है, जहां वे अब रहते हैं. एक अवॉर्ड विनिंग डॉक्यूमेंटरी फिल्म में इन्हें कवर भी किया गया है. 

इनके काम पर बनी डॉक्यूमेंट्री
सीमित संसाधनों के साथ विशेष रूप से कोविड -19 के समय जब वन्यजीव बचाव केंद्र के लिए धन जुटाने में दिक्कत आने लगी ऐसे समय में 30 साल के इन युवकों ने जो काम किया वो वाकई काबिले तारीफ है. दोनों भाई मानते हैं कि डॉक्यूमेंट्री फिल्म से उन्हें पहचान मिलेगी और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे उनके केंद्र को समर्थन भी मिलेगा. अभी केंद्र का खर्च दोनों भाई घर के बेसमेंट से चलने वाले साबुन-डिस्पेंसर के धंधे की कमाई से पूरा कर रहे हैं. 

रिपोर्ट छपने के बाद लोगों ने की मदद
शहजाद ने कहा, "हम केवल अपने छोटे व्यवसाय के कारण पक्षियों को बचाने में कामयाब रहे." “कुछ समाचार लेखों में हमारे काम को प्रदर्शित करने के बाद लोगों ने हमें पैसा देना शुरू कर दिया, लेकिन महामारी के बाद योगदान कम हो गया है. हमें वेतन देना होता है और केंद्र के लिए भोजन, दवाएं, उपकरण आदि खरीदना होते हैं. हमें अपने परिवारों का पूरा समर्थन प्राप्त है और हमें उम्मीद है कि डॉक्यूमेंट्री से भी हमे मदद मिलेगी.”

डॉक्यूमेंट्री को मिला ग्लोबल पहचान
दिल्ली के फिल्म निर्माता शौनक सेन की फिल्म 'ऑल दैट ब्रीथ्स' ने 28 जनवरी को अमेरिका के यूटा में सनडांस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में वर्ल्ड सिनेमा डॉक्यूमेंट्री ग्रैंड जूरी पुरस्कार जीता. शहजाद ने कहा, "हमने कभी नहीं सोचा था कि यह एक वैश्विक मामला बन जाएगा. लेकिन अब जब हम जीत ही गए हैं तो हमें उम्मीद है कि युवा इसे देखेंगे और सीखेंगे कि उन्हें अपने सपनों से पीछे नहीं हटना चाहिए.”

हर दिन चोटिल मिलते हैं पक्षी
अपने काम के बारे में बात करते हुए शहजाद ने कहा, “हमें हर दिन औसतन 10 पक्षी चोटिल मिलते हैं. हम अपने संसाधनों से सीमित हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश को लेने की कोशिश करते हैं. जिन पक्षियों का हम इलाज करते हैं उनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें धार्मिक ट्रस्टों द्वारा संचालित अधिकांश धर्मार्थ पक्षी अस्पताल स्वीकार करने या इलाज करने से इनकार करते हैं क्योंकि वे शिकार या मांस खाने वाले पक्षी हैं.”

घर की छत पर हैं 300 पक्षी
इन भाइयों के घर की छत पर लगभग 300 पक्षी हैं, जिनमें से एक ब्लैक काइट, कुछ काले कान वाली काइट, तीन मिस्र के गिद्ध, एक उल्लू और एक मवेशी का बछड़ा है,  सभी चोटों से उबर रहे हैं. इनमें से कुछ अब दोबारा उड़ान नहीं भर सकेंगे. पशु चिकित्सक डॉ जे पी पांडे और सहायक सालिक रहमान सहित चार लोगों की टीम ने अकेले पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियों का इलाज और पुनर्वास किया है.

पतंग का मांझा है मु्ख्य कारण
एवियन प्रजातियों के लिए खतरों के बारे में बात करते हुए सऊद ने कहा, “दिल्ली में कांच लगे मांझे पर प्रतिबंध है, फिर भी यह बिकते हैं और हर साल इसकी चपेट में आने से कई पक्षी मर जाते हैं. अगस्त में पतंगबाजी चरम पर होती है इसलिए यह सबसे खतरनाक महीना होता है. पिछले साल हमने 2,100 पक्षियों का इलाज किया, जिनमें से 400 अगस्त में घायल हुए थे." भाइयों ने हाल ही में अपने काम के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए wildliferescue.org.in और raptorrescue.org नामक वेबसाइट विकसित की है.

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