
केरल के अलप्पुझा की प्रसिद्ध पुत्रमाडा झील इस शनिवार एक बार फिर से रोमांच से भर जाएगी. यहां आयोजित होने जा रही है 71वीं नेहरू ट्रॉफी बोट रेस, जिसे न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में बेहद प्रतिष्ठित और लोकप्रिय वाटर स्पोर्ट्स फेस्टिवल माना जाता है. यह आयोजन सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि केरल की संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक भावना का प्रतीक है.
यह प्रतियोगिता केरल के कुट्टनाड इलाके में होती है, जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है. यहां हर गांव और हर किनारे का अपना बोट क्लब होता है, और स्थानीय लोग इन नावों से अपनी पहचान और सम्मान जोड़कर देखते हैं. जीत और हार सिर्फ खेल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह लोगों की भावनाओं, गर्व और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ जाती है.
इस रेस की सबसे आकर्षक और प्रतिष्ठित श्रेणी है ‘चुंडन वल्लम’ (स्नेक बोट रेस). लंबी और पतली डिजाइन वाली इन बोट्स का इतिहास सदियों पुराना है. कभी इनका इस्तेमाल राजा युद्ध में हथियार ले जाने के लिए करते थे. आज ये बोट अपनी तेज़ रफ्तार और एयरोडायनामिक डिज़ाइन के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. इस साल स्नेक बोट कैटेगरी में 21 टीमें हिस्सा ले रही हैं, और हर कोई नेहरू ट्रॉफी जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक देगा
पल्लथुरुथी बोट क्लब, लगातार जीत की ओर
पिछले पांच साल से लगातार ट्रॉफी अपने नाम कर रही पल्लथुरुथी बोट क्लब (PBC) इस बार छठी जीत के इरादे से मैदान में उतरेगी. क्लब की कमान ऐलन मनुथैकल और उनके बेटे ईडन मनुथैकल के पास है. कार्यकारी अध्यक्ष सुनीर बताते हैं कि टीम की सफलता का राज है:
इस बार PBC ‘मेलपादन चुंडन’ बोट से उतरेगी, जिसमें कुल 96 सदस्य होंगे. क्लब ने 45 दिनों का विशेष ट्रेनिंग कैंप आयोजित किया था, जिसमें 125 खिलाड़ियों को चुना गया. कैंप में पंचिंग सिस्टम और सीसीटीवी तक लगाए गए ताकि कोई खिलाड़ी अभ्यास से अनुपस्थित न हो.
कठोर चयन प्रक्रिया और अनुशासित दिनचर्या
टीम चयन की प्रक्रिया बेहद सख्त होती है. सोशल मीडिया पर 18 से 25 साल के युवाओं को बुलाया जाता है. शुरुआती स्क्रीनिंग और ट्रेनिंग के बाद केवल वही खिलाड़ी टीम का हिस्सा बन पाते हैं, जो शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं. खिलाड़ियों की दिनचर्या भी पूरी तरह अनुशासित होती है:
नेहरू ट्रॉफी का इतिहास
इस प्रतियोगिता की शुरुआत 1952 में हुई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अलप्पुझा आए थे. उनके स्वागत में स्नेक बोट्स की कतार सजाई गई थी. नेहरू इतने उत्साहित हुए कि खुद बोट पर सवार हो गए. तभी से इस प्रतियोगिता को उनके नाम से जोड़ा गया और विजेता टीम को ‘नेहरू ट्रॉफी’ से सम्मानित किया जाने लगा.