blind elderly woman
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सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते अक्सर लोगों की उम्मीद टूट जाती है, लेकिन राजस्थान के जालोर से सिस्टम का एक संवेदनशील चेहरा भी सामने आया है. यहां 80 वर्षीय दृष्टिहीन महिला अपनी बंद पेंशन दोबारा शुरू कराने की गुहार लेकर जिला कलेक्ट्रेट पहुंची. महिला की हालत देखकर जिला कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे खुद अपने चैंबर से बाहर आए, गैलरी में ही उनकी बात सुनी और अधिकारियों को मौके पर कार्रवाई के निर्देश दिए. इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो और तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं.
5 साल से बंद थी बुजुर्ग महिला की पेंशन
80 वर्षीय कोकु देवी आहोर तहसील के जेतपुरा गांव की रहने वाली हैं. वह दृष्टिहीन हैं और उम्र के कारण चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं. परिवार का आरोप है कि करीब पांच साल पहले बायोमेट्रिक सत्यापन के दौरान उनके फिंगरप्रिंट मैच नहीं हुए, जिसके बाद पेंशन बंद कर दी गई. तब से परिवार एसडीएम कार्यालय, तहसील और सामाजिक न्याय विभाग के लगातार चक्कर लगा रहा था, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला. किसी अधिकारी ने उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया.
सुरक्षाकर्मी ने व्हीलचेयर पर बैठाकर पहुंचाया
जब कोकु देवी कलेक्ट्रेट पहुंचीं तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी चेनाराम ने उनकी हालत देखकर मदद की. उन्होंने बुजुर्ग महिला को व्हीलचेयर पर बैठाया और कलेक्टर के चैंबर तक पहुंचाया. महिला के पहुंचने की जानकारी मिलते ही जिला कलेक्टर खुद बाहर आ गए.
कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे ने गैलरी में ही कोकु देवी की पूरी बात सुनी. इसके बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधिकारियों को तुरंत बुलाकर बंद पेंशन दोबारा शुरू कराने, जरूरी दस्तावेज पूरे कराने और आवास सहित सभी पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के निर्देश दिए.
कलेक्टर ने कहा कि मामले का निस्तारण कर दिया गया है. अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि पेंशन जल्द शुरू कराई जाए और वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान किया जाए.
पति और दोनों बेटों को खो चुकी हैं कोकु देवी
कोकु देवी का परिवार पहले से ही कई मुश्किलों का सामना कर चुका है. करीब 20 साल पहले उनके पति की कैंसर से मौत हो गई थी. इसके बाद समय के साथ दोनों बेटों का भी निधन हो गया. अब परिवार में केवल महिलाएं और एक पोती हैं, जिनके सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है. ऐसे में बंद पेंशन उनके लिए आर्थिक सहारे का एक महत्वपूर्ण जरिया थी.
अगर समाधान संभव था तो 5 साल इंतजार क्यों?
इस घटना ने सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ओर बुजुर्ग महिला पांच साल तक अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाती रही, वहीं दूसरी ओर कलेक्ट्रेट पहुंचने के कुछ ही मिनटों में अधिकारियों को निर्देश जारी हो गए. ऐसे में सवाल उठता है कि जब समाधान संभव था, तो उसे इतने वर्षों तक क्यों टाला गया?
ओडिशा में भी सामने आया था ऐसा ही मामला
सरकारी व्यवस्था की लापरवाही का ऐसा ही एक मामला हाल ही में ओडिशा के क्योंझर जिले में भी सामने आया था. वहां आदिवासी युवक जीतू मुंडा अपनी मृत बहन कलारा मुंडा का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया. जीतू कई बार बैंक जाकर बहन के खाते से 20 हजार रुपए निकालने की कोशिश कर चुका था. उसने कर्मचारियों को बहन की मौत की जानकारी भी दी थी, लेकिन हर बार उससे खाताधारक को बैंक लाने के लिए कहा गया. आखिरकार व्यवस्था से परेशान होकर उसने बहन का कंकाल कब्र से निकालकर बैंक में पेश कर दिया. मामला जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तब जाकर बैंक कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही की गई.
-नरेश कुमार की रिपोर्ट
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