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सूरत के गौसेवकों की अनोखी पहल, गाय के गोबर और लकड़ी से बनाई इको फ्रेंडली राखी, चीन की राखियों को देगी टक्कर

सूरत की माधव गौ शाला में बन रही यह राखी पूरी तरह से प्राकृतिक चीजों से बनाई गई है. इसमें मुख्य रूप से गाय के गोबर (गोमय) और लकड़ी का प्रयोग किया गया है. यह राखी दिखने में सुंदर होने के साथ-साथ 100% इको-फ्रेंडली है.

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क्षाबंधन के त्योहार को लेकर सूरत के गौसेवकों ने इस बार अनोखी पहल की है. यहां माधव गौशाला में गाय के गोबर और लकड़ी से इको-फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं. गौसेवकों का कहना है कि इस पहल का मकसद पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली प्लास्टिक की राखियों से लोगों को दूर करना और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना है. इन राखियों को इस्तेमाल करने के बाद मिट्टी में डालने पर इनसे प्राकृतिक रूप से खाद तैयार किया जा सकता है.

गोबर और लकड़ी से तैयार की राखी
सूरत की माधव गौशाला में तैयार की जा रही इन राखियों में मुख्य रूप से गाय के गोबर और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है. राखी को आकर्षक बनाने के लिए इसमें रेशमी धागे और रेशम की गोलियों का भी उपयोग किया गया है. गौसेवकों के मुताबिक, सामान्य प्लास्टिक या मेटैलिक राखियों के मुकाबले यह राखी पर्यावरण के अनुकूल है. उनका कहना है कि त्योहारों के दौरान बाजार में बड़ी संख्या में प्लास्टिक की राखियां आती हैं. ऐसे में प्राकृतिक चीजों से बनी राखी के जरिए लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की कोशिश की जा रही है.

गौमय राष्ट्रीय अभियान से जोड़कर दे रहे संदेश
गौसेवक अरुण पाटोदिया ने बताया कि गाय को भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान दिया गया है. उन्होंने कहा कि इसी भावना को ध्यान में रखते हुए गौमय राष्ट्रीय अभियान के तहत यह राखी तैयार की गई है. उनके मुताबिक, राखी के जरिए बहनों और भाइयों तक गौसेवा और स्वदेशी उत्पादों का संदेश पहुंचाने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि इन राखियों को सोसाइटी, घर और बाजार तक पहुंचाया जाएगा. सूरत के अलावा देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग राखी मंगवा सकेंगे. इसके लिए कूरियर के जरिए राखियां भेजने की व्यवस्था की जाएगी.

अरुण ने बताया कि राखी तैयार करने के लिए सबसे पहले गोबर लिया गया. इसके बाद लकड़ी का आधार तैयार किया गया और उसमें रेशमी धागे का इस्तेमाल किया गया. इसी तरह अलग-अलग प्राकृतिक चीजों को जोड़कर राखी तैयार की गई है.

प्लास्टिक की राखियों का विकल्प देना मकसद
गौसेवक ललित शर्मा ने कहा कि रक्षाबंधन पूरे देश में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार है. इस मौके पर ऐसी राखी तैयार करने की कोशिश की गई है, जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए. आजकल प्लास्टिक की राखियों का चलन बढ़ गया है और बाजार में बड़ी संख्या में ऐसी राखियां बिकती हैं. इसी वजह से गोबर और लकड़ी से बनी राखी तैयार की गई है. उनका कहना है कि इससे लोगों का गौ-आधारित उत्पादों के साथ जुड़ाव भी बढ़ेगा.

ललित शर्मा ने गोबर से रेडिएशन से सुरक्षा मिलने का भी दावा किया. उन्होंने कहा कि मोबाइल और टावरों की वजह से रेडिएशन बढ़ रहा है और यह राखी उससे बचाव में उपयोगी हो सकती है. उन्होंने गोबर में स्वर्ण तत्व पाए जाने का भी दावा किया.

गाय से जुड़ाव का अहसास कराना चाहते हैं
हर्षा अग्रवाल ने कहा कि रक्षाबंधन भाई-बहन के मजबूत रिश्ते का त्योहार है. गोबर से बनी राखी तैयार करने के पीछे पर्यावरण से जुड़ने का संदेश भी है. उन्होंने कहा कि बाजार में मिलने वाली फैंसी और मेटैलिक राखियों के बजाय प्राकृतिक चीजों से बनी राखी इस्तेमाल करने से पर्यावरण को नुकसान कम होगा. साथ ही भाई की कलाई पर ऐसी राखी बांधने से गाय और प्रकृति से जुड़ाव की भावना भी मजबूत होगी. उनके मुताबिक, गाय से मिलने वाली प्राकृतिक चीजों से बनी राखी के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जा रहा है कि गौमाता का सम्मान किया जाए और प्राकृतिक उत्पादों को अपनाया जाए.

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