
history of watermelon
history of watermelon
गर्मी आते ही अगर किसी एक फल का इंतजार सबसे ज्यादा होता है, तो वो है तरबूज. रसीले, ठंडक देने वाले तरबूज का क्रेज ऐसा है कि दुनिया भर में हर साल 100 मिलियन टन से ज्यादा इसकी पैदावार होती है. 1200 से भी ज्यादा किस्मों में मिलने वाले इस फल को नेचुरल कूलर कहा जाता है. प्यास बुझानी हो या कुछ मीठा-रसीला खाना हो...तरबूज हर मौके पर फिट बैठता है.
5000 साल पुराना है तरबूज का सफर
तरबूज कोई नया फल नहीं, बल्कि इसका इतिहास करीब 5000 साल पुराना है. सबसे पहले इसकी खेती मिस्र में हुई थी. वहां के 12वें राजवंश के पुरातात्विक स्थलों पर इसके बीजों के प्रमाण मिले हैं. मिस्र के प्राचीन शिलालेखों में भी अलग-अलग तरह के तरबूजों की तस्वीरें देखी गई हैं.
उस दौर में कालाहारी रेगिस्तान से गुजरने वाले व्यापारियों के जरिए तरबूज के बीज अफ्रीका के कई हिस्सों तक पहुंचे. नील नदी के किनारे खेती करने वाले मिस्रवासियों ने इसे खूब उगाया और यहीं से इसका सफर पूरे अफ्रीका में फैल गया.

चीन से एशिया तक...तरबूज का विस्तार
9वीं शताब्दी तक तरबूज चीन में भी खूब उगाया जाने लगा और वहां के साहित्य में इसका जिक्र मिलता है. इसके बाद ये फल भारत समेत पूरे एशिया में फैल गया. यूनानी और रोमन सभ्यताओं ने भी इसे अपनाया और अपनी खानपान संस्कृति का हिस्सा बना लिया. दिलचस्प बात ये है कि Watermelon शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1615 में अंग्रेजी शब्दकोश में दर्ज हुआ था.
सेहत का खजाना है तरबूज
तरबूज सिर्फ स्वाद में ही नहीं, सेहत में भी नंबर वन है. इसका हर हिस्सा गूदा, बीज और यहां तक कि छिलका भी...फायदेमंद होता है. कई देशों में इसके छिलके का अचार भी बड़े शौक से खाया जाता है.
तरबूज खाने के फायदे
तरबूज में करीब 92% पानी होता है, जो शरीर को हाइड्रेट रखता है, जबकि फाइबर पाचन में मदद करता है. रिसर्च बताती है कि यह फेफड़ों, पेट और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को कम करने में भी सहायक हो सकता है. करीब 85 से 100 दिनों में तैयार होने वाला ये फल आज गर्मियों का सबसे लोकप्रिय विकल्प बन चुका है.

जब तरबूज बना जंग की वजह!
तरबूज की कहानी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास में इसके लिए जंग भी लड़ी जा चुकी है. राजस्थान में बीकानेर और नागौर रियासत के बीच इसके लिए लड़ाई हो चुकी है.
बीकानेर के एक किसान की तरबूज की बेल बढ़ते-बढ़ते नागौर की सीमा में पहुंच गई और वहीं एक फल लग गया. बीकानेर का दावा था कि जड़ें उसकी जमीन में हैं, इसलिए फल भी उसका है. वहीं नागौर का कहना था कि फल उसकी जमीन पर है, तो हक भी उसी का है. बस इसी बात पर युद्ध छिड़ गया. हजारों सैनिक मैदान में उतरे और आखिरकार बीकानेर रियासत की जीत हुई.