
Sleep Shaming
Sleep Shaming
सुबह के 8-9 बज रहे हैं. आप गहरी नींद में हैं. तभी कमरे का दरवाजा खुलता है. कोई लाइट जला देता है, कोई पंखा बंद कर देता है, तो कोई जोर से कहता है- 'अब तक सो रहे हो? उठो, सुबह हो गई है!' अगर फिर भी आंखें न खुलें तो ताने शुरू 'इतनी नींद किसे आती है?', 'सुबह जल्दी उठना सीखो', 'सोते ही रहोगे तो जिंदगी में क्या करोगे?'
भारतीय परिवारों में शायद ही कोई घर ऐसा होगा जहां ऐसा न होता हो. यहां सुबह जल्दी उठने को अनुशासन और देर तक सोने को आलस से जोड़ दिया गया है. लेकिन क्या हर बार किसी की नींद तोड़ना वाकई अच्छी आदत है? अगर किसी व्यक्ति की नींद पूरी नहीं हुई है तो उसे जबरदस्ती जगाना उसके दिमाग और शरीर दोनों के लिए ठीक नहीं.
स्लीप शेमिंग आखिर है क्या?
किसी व्यक्ति को ज्यादा सोने, देर से उठने या दिन में सोने के लिए बार-बार ताना देना, उसे आलसी कहना या उसकी नींद को गैरजरूरी बताना स्लीप शेमिंग कहलाता है. भारत में यह समस्या काफी आम है. हमने बचपन से यह मान लिया है कि जो सुबह जल्दी उठता है, वही अनुशासित है और जो देर तक सोता है, वह आलसी है. जबकि शरीर की नींद की जरूरत हर व्यक्ति में अलग हो सकती है. यानी सिर्फ घड़ी देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी इंसान को अब उठ जाना चाहिए.
नींद टाइम पास नहीं शरीर की जरूरत
सोते समय हमारा शरीर आराम जरूर करता है, लेकिन दिमाग पूरी तरह बंद नहीं होता. नींद के दौरान दिमाग दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है और शरीर खुद को रिकवर करने का काम करता है. अच्छी नींद मूड, ध्यान लगाने की क्षमता, याददाश्त और फैसले लेने की क्षमता को बेहतर रखने में मदद करती है. नींद शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में भी अहम भूमिका निभाती है. यही वजह है कि रोज नींद पूरी न होने पर अगले दिन चिड़चिड़ापन, थकान, ध्यान लगाने में परेशानी और काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
सुबह जल्दी उठना हर किसी के लिए जरूरी नहीं
हमारे यहां सुबह 5 बजे उठने को अक्सर सफलता और अनुशासन से जोड़ दिया जाता है. लेकिन नींद का मामला इतना सीधा नहीं है.

हर व्यक्ति की बॉडी क्लॉक एक जैसी नहीं होती. कुछ लोग स्वाभाविक रूप से सुबह जल्दी उठने में सहज होते हैं, जबकि कुछ लोगों को रात में ज्यादा सक्रिय महसूस होता है और सुबह उठने में समय लगता है.
इसका मतलब यह नहीं कि देर तक सोने वाला हर व्यक्ति आलसी है. असली सवाल यह है कि वह कितने घंटे सो रहा है और उसकी नींद कितनी नियमित और अच्छी है.
Gen Z की नींद को आलस समझना भी गलत
आज की युवा पीढ़ी की नींद का पैटर्न पहले की पीढ़ियों से अलग दिखाई देता है. पढ़ाई, ऑफिस, सोशल मीडिया, ऑनलाइन कंटेंट और देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत के कारण कई युवा देर से सोते हैं. किशोरों और युवाओं में शरीर की इंटरनल क्लॉक में भी ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जिनकी वजह से उन्हें देर रात तक जागना आसान और सुबह जल्दी उठना मुश्किल लगता है. ऐसे में रात 1-2 बजे सोने वाले व्यक्ति को सुबह 6 बजे उठाकर फिर उसे पूरे दिन सुस्त रहने के लिए ताना देना समस्या का समाधान नहीं है. जरूरत यह समझने की है कि उसकी नींद पूरी क्यों नहीं हो रही.
घर में नींद तोड़ने का तरीका भी मायने रखता है
मान लीजिए कोई व्यक्ति अभी गहरी नींद में है. आप कमरे में घुसे, लाइट ऑन की, पंखा बंद किया, दरवाजा जोर से बंद किया और फिर बोले- उठो!.. नींद अचानक टूटने से व्यक्ति कुछ देर तक सुस्ती, चिड़चिड़ापन या भ्रम जैसा महसूस कर सकता है. इसे स्लीप इनर्शिया कहा जाता है. यह वह स्थिति है जिसमें जागने के तुरंत बाद दिमाग पूरी तरह अलर्ट होने में कुछ समय लेता है. इसलिए किसी की नींद जरूरी वजह के बिना बार-बार तोड़ना अच्छी आदत नहीं मानी जाती.
देर तक सोना भी हमेशा सही नहीं
यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है. स्लीप शेमिंग का मतलब यह नहीं कि जितना मन करे उतना सोते रहें. अगर कोई व्यक्ति रोज बहुत देर से सोता है, दिन में लंबे समय तक सोता रहता है और इसके कारण उसकी पढ़ाई, नौकरी, रोजमर्रा के काम या सामाजिक जीवन प्रभावित हो रहे हैं, तो नींद के पैटर्न पर ध्यान देना जरूरी है.
इसी तरह अगर पर्याप्त समय बिस्तर पर बिताने के बावजूद लगातार थकान रहती है, बार-बार नींद आती है या नींद की गुणवत्ता खराब रहती है, तो इसके पीछे कोई और कारण भी हो सकता है.
अच्छी नींद सेहत के लिए क्यों जरूरी?
अच्छी नींद शरीर और दिमाग दोनों को स्वस्थ रखने के लिए बेहद जरूरी है. सोते समय शरीर खुद को रिकवर करता है और दिमाग दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करने का काम करता है. पर्याप्त नींद से याददाश्त, एकाग्रता, मूड और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर रहती है. यह इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करने के साथ शरीर की ऊर्जा बनाए रखने में भी मदद करती है. इसके उलट लगातार कम या खराब नींद लेने से दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है.
कितने घंटे सोना चाहिए?
नींद की जरूरत उम्र के हिसाब से बदलती है. 18 से 64 साल के वयस्कों को आमतौर पर हर रात कम से कम 7 घंटे की नींद लेनी चाहिए, जबकि ज्यादातर वयस्कों के लिए करीब 7-9 घंटे की नींद पर्याप्त मानी जाती है. किशोरों को करीब 8-10 घंटे, 6-12 साल के बच्चों को 9-12 घंटे और 3-5 साल के बच्चों को 10-13 घंटे की नींद की जरूरत होती है.
ये भी पढ़ें: