scorecardresearch

आराम के लिए उठाया फोन कैसे बन जाता है तनाव का कारण? क्यों हम बिना रुके स्क्रॉल करते रहते हैं? जानिए बैलेंस्ड डिजिटल लाइफ के तरीके

आजकल हर उम्र के लोग घंटों स्क्रीन पर स्क्रॉल करते दिखाई देते हैं. शुरुआत जहां सिर्फ जानकारी लेने या मनोरंजन तक सीमित थी, वहीं अब यह आदत कई लोगों के लिए एक तरह की मानसिक निर्भरता बनती जा रही है. लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, रील्स और खबरों की बाढ़ कई बार हमें बिना एहसास के घंटों स्क्रीन से चिपकाए रखती है.

doomscrolling doomscrolling
हाइलाइट्स
  • फोन की आदत बिगाड़ रही है मानसिक सेहत

  • डिजिटल दुनिया में खो रहा है असली सुकून

आज के समय में अगर किसी से पूछा जाए कि वह अपने स्मार्टफोन में सबसे ज्यादा किन ऐप्स का इस्तेमाल करता है, तो ज्यादातर लोग फेसबुक, इंस्ट्राग्राम और स्नैपचैट का नाम लेंगे. बच्चे हों या बुजुर्ग, लगभग हर उम्र के लोग आज सोशल मीडिया से जुड़े हैं. सोशल मीडिया हमें दुनिया से अपडेट तो रखता है, लेकिन इसकी लगातार स्क्रॉलिंग अब कई लोगों के लिए आदत ही नहीं, बल्कि एक तरह की लत बनती जा रही है. लगातार नोटिफिकेशन, रील्स और खबरों की बाढ़ कई बार हमें जरूरी कामों से भी भटका देती है.

खुद को रिलैक्स करने के लिए उठाया गया फोन कैसे आपके लिए तनाव का कारण बन रहा है? क्यों हम बिना रुके स्क्रॉल करते रहते हैं? और इन्हीं में जीवन का कीमती समय निकाल देते हैं. इन सभी के जवाब ढूंढने के लिए GNT ने बात की 'द माइंड पैलेट्स' की सीनियर साइकोलॉजिस्ट मोनिका शर्मा से.

स्क्रॉलिंग और डूमस्क्रॉलिंग में क्या फर्क है?
मोनिका शर्मा बताती हैं कि सामान्य स्क्रॉलिंग, डूमस्क्रॉलिंग से काफी हद तक अलग है. सामान्य स्क्रॉलिंग में व्यक्ति अपनी इच्छा से, सीमित समय के लिए सोशल मीडिया या न्यूज फीड देखता है. इसमें अलग-अलग तरह का कंटेंट होता है कुछ सकारात्मक, कुछ सामान्य और कुछ आपकी जानकारी के लिए तो कुछ निगेटिव. यह अनुभव अक्सर हल्का और मनोरंजक हो सकता है.

लेकिन डूमस्क्रॉलिंग का मतलब है आपकी फीड में लगातार नकारात्मक, डराने वाली या परेशानी बढ़ाने वाले कंटेंट का होना. इसमें व्यक्ति खुद को रोक नहीं पाता और आखिर में थकान, तनाव या बेचैनी महसूस करता है. यही इसका सबसे खतरनाक पहलू है.

Doomscrolling

हम बिना सोचे-समझे क्यों स्क्रॉल करते रहते हैं?

1. अनलिमिटेड स्क्रॉल डिजाइन: आजकल ऐप्स में पेज खत्म होने का विकल्प नहीं होता. स्क्रीन पर बस लगातार नया कंटेंट आता रहता है, जिससे दिमाग को रुकने का संकेत नहीं मिलता.

2. डोपामिन का असर: हर नए पोस्ट, लाइक या नोटिफिकेशन से दिमाग में थोड़ी खुशी मिलती है. यह एक रिवॉर्ड सिस्टम की तरह काम करता है, जिससे बार-बार फोन देखने की इच्छा बढ़ती है.

3. अगला कंटेंट क्या होगा: हर बार यह नहीं पता होता कि अगला पोस्ट कैसा होगा. यही अनिश्चितता हमें एक और स्क्रॉल के लिए फोर्स करती है.

4. आदत और ऑटो मोड व्यवहार: कई बार बोरियत या खाली समय में हम बिना सोचे फोन उठा लेते हैं और स्क्रॉलिंग शुरू हो जाती है.

5. फियर ऑफ मिसिंग आउट (FOMO): यह डर कि कहीं कोई जरूरी खबर या अपडेट छूट न जाए, हमें लगातार फीड चेक करने पर मजबूर करता है.

फोन की आदत बिगाड़ रही है मानसिक सेहत
फोन की आदत बिगाड़ रही है मानसिक सेहत

स्क्रॉल करने के बाद लोग और ज्यादा तनाव क्यों महसूस करते हैं?
निगेटिविटी बायस:
इंसानी दिमाग स्वाभाविक रूप से बुरी खबरों पर ज्यादा ध्यान देता है. सोशल मीडिया इसे और बढ़ा देता है क्योंकि वहां ऐसी खबरें तेजी से फैलती हैं.

सोशल तुलना: लोग दूसरों की खूबसूरत और चुनी हुई जिंदगी देखकर अपनी तुलना करने लगते हैं, जिससे आत्म-संतुष्टि कम होती है.

ओवरस्टिमुलेशन: लगातार बदलती तस्वीरें, वीडियो और जानकारी दिमाग को आराम नहीं लेने देती, जिससे मानसिक थकान बढ़ती है.

आराम का असली तरीका छिन जाना: जब हम खाली समय में फोन का इस्तेमाल करते हैं, तो दिमाग को आराम नहीं मिल पाता.

गुस्सा और डर बढ़ाने वाला कंटेंट: ऐसा कंटेंट जो भावनात्मक रूप से तेज प्रतिक्रिया देता है, ज्यादा वायरल होता है, लेकिन यह मानसिक तनाव भी बढ़ाता है.

सोशल मीडिया हमें कैसे डूमस्क्रॉलिंग की तरफ धकेलता है?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के पीछे काम करने वाले एल्गोरिदम इस आदत को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. ये एल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताए. इसके लिए वह वही कंटेंट दिखाते हैं जिस पर यूजर पहले रिएक्ट कर चुका होता है.

अगर कोई व्यक्ति एक बार भी निगेटिव खबरें देखता है, तो उसे उसी तरह की और खबरें दिखने लगती हैं. धीरे-धीरे यह एक सर्कल बन जाता है जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. ऑटोप्ले वीडियो, लगातार नोटिफिकेशन और अनलिमिटेड स्क्रॉलिंग जैसे फीचर्स भी इस आदत को और मजबूत बनाते हैं.

टेक्नोलॉजी के साथ हेल्दी कनेक्शन कैसे रखें?
लिमिट तय करें: दिन में सोशल मीडिया के लिए निश्चित समय तय करें.
माइंडफुल यूज़ करें: फोन उठाने से पहले सोचें कि क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं.
फीड को साफ रखें: नकारात्मक कंटेंट को अनफॉलो या म्यूट करें.
ऑफलाइन आदतें बढ़ाएं: किताब पढ़ना, वॉक करना या हॉबी अपनाना.
नो-फोन टाइम रखें: खासकर खाने और सोने से पहले नो फोन टाइम की आदत आपको मानसिक शांति दिलाएगी.
डिजिटल डिटॉक्स करें: हफ्ते में एक दिन या कुछ घंटे फोन से दूरी बनाएं.

ये भी पढ़ें: