
World Wildlife Day
World Wildlife Day
3 मार्च को World Wildlife Day मनाया जाता है. इस दिन आमतौर पर जंगलों में रहने वाली जानकरों जैसे बाघ, चीता, हाथी, गैंडे और दुर्लभ प्रजातियों की होती है. आंकड़े गिनाए जाते हैं, संरक्षण की योजनाएं बताई जाती हैं लेकिन वन्यजीव सिर्फ घने जंगलों तक सीमित नहीं हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो कभी हमारे घरों, आंगनों का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन आज लगभग लुप्त होने की कगार पर है. इन्हीं में से एक है गौरैया.
कम्युनिटी बर्ड कहलाती है गौरैया
दुनिया के अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में खुद को ढाल लेने वाली गौरैया अब शहरों से कम होती जा रही है. गौरैया दुनिया की उन गिनी-चुनी पक्षियों में है जो इंसानों के बेहद करीब रहना पसंद करती हैं. इसे कम्युनिटी बर्ड भी कहा जाता है, क्योंकि यह गांव-शहर, बाजार और घरों के आसपास ही अपना बसेरा बनाती है.
एक बार में 3 से 5 अंडे देती है गौरैया
गौरैया प्रजनन के मामले में तेज मानी जाती है. मादा एक बार में 3 से 5 अंडे देती है. करीब 14 दिन में बच्चे निकल आते हैं और दो हफ्तों में उड़ना सीख जाते हैं.
इंसानों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली चिड़िया
House Sparrow मूल रूप से यूरेशिया और उत्तरी अफ्रीका की प्रजाति है. लेकिन यह इतनी अनुकूलनशील (एडेप्टेबल) है कि इंसानों के साथ-साथ पूरी दुनिया में फैल गई. आज अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप में इसकी मौजूदगी है.

करीब 200 साल पहले तक उत्तरी अमेरिका में एक भी हाउस स्पैरो नहीं थी. 1851 में इंग्लैंड से इसे अमेरिका के ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क में लाया गया. आज अनुमान है कि सिर्फ उत्तरी अमेरिका में ही इनकी संख्या 15 करोड़ से ज्यादा है.
समुद्र तल से 280 फीट नीचे से लेकर 10,000 फीट ऊंचाई तक
गौरैया की सबसे बड़ी खासियत इसकी अनुकूलन क्षमता है. यह कैलिफोर्निया की डेथ वैली में समुद्र तल से 280 फीट नीचे भी पाई गई है और कोलोराडो के रॉकी पर्वतों में 10,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर भी.
इतना ही नहीं, इंग्लैंड के यॉर्कशायर में 700 फीट गहरी कोयला खदान के अंदर भी इनका बसेरा देखा गया है, जहां खनिक इन्हें दाना खिलाते थे. यानी जहां इंसान, वहां गौरैया.
इंसान कम, तो गौरैया भी कम
विशेषज्ञ मानते हैं कि गौरैया इंसानों से बहुत दूर नहीं रहती. अगर किसी इलाके में गौरैया कम दिखती है, तो अक्सर वहां इंसानी आबादी भी कम होती है. यह पक्षी हमारे घरों, बाजारों और इमारतों के आसपास ही घोंसला बनाती है.

उछल-उछलकर आगे बढ़ती है गौरैया
जमीन पर चलते समय भी इसका अंदाज अलग है. यह ज्यादातर चलती नहीं, बल्कि उछल-उछलकर आगे बढ़ती है. चलना कम ही देखा जाता है और वह भी ज्यादातर बूढ़ी गौरैयाओं में.
तैर भी सकती है, जरूरत पड़े तो पानी के नीचे भी
कम ही लोग जानते हैं कि गौरैया जरूरत पड़ने पर तैर भी सकती है. खतरा महसूस होने पर इसे पानी के भीतर तैरते हुए भी देखा गया है. यानी यह सिर्फ हवा की नहीं, पानी की भी खिलाड़ी है.
गौरैया को अपने घर तक कैसे लाएं?
घर की बालकनी या छज्जे में लकड़ी का नेस्ट बॉक्स लगाएं.
रोजाना एक कटोरी में पानी रखें, खासकर गर्मियों में.
घर की बालकनी या छज्जे पर बाजरा, चावल या टूटे हुए अनाज रखें.
कीटनाशकों का कम से कम इस्तेमाल करें.