Madan Mohan Temple
Madan Mohan Temple
झारखंड की राजधानी रांची के बोरिया में स्थित मदन मोहन मंदिर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई जा रही है. इस मंदिर को कृष्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. 361 साल पुराना मदन मोहन मंदिर में हर साल भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भव्य तरीके से मनाया जाता है. इस मंदिर की स्थापना लक्ष्मी नारायण तिवारी ने साल 1665 में मुगल काल के दौरान की थी. तिवारी के वंशज बताते हैं कि जब गीता और द्वापर में भक्ति भाव का संदेश का पाठ पढ़ाया जाता तो यहां आने वाले हजारों भक्त यहां की प्रतिमा की सुंदरता, यहां का वास्तु और मंदिर में जल संरक्षण की व्यवस्था को देखकर दंग रह जाते थे. वाटर हार्वेस्टिंग का साढ़े तीन सौ साल पुराना सोच ये बताती है कि इस मुद्दे पर पहले के लोग आज के लोगों से शायद ज्यादा संजीदा थे.
सभी की मनोकामनाएं होती हैं पूरी
मंदिर के संस्थापक के वंशज व मंदिर के सचिव बताते हैं कि देश में भले ही पानी की कमी कहीं हो जाए लेकिन यहां ऐसा कभी नहीं हुआ है. ईश्वर की कृपा ऐसी है. साथ ही मंदिर द्वारा जल संरक्षण के संदेश को यहां के लोगों ने ऐसा आत्मसात किया है कि कभी पानी किल्लत नहीं देखनी पड़ती है. जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर के पुजारी और वीना ने बताया की हजारों भक्त यहां आते हैं. कई पौराणिक मान्यता मंदिर से जुड़ी हुई है. साथ ही सबकी मनोकामना जरूर पूर्ण होती है.
सामाजिक समरसता का संदेश
मंदिर के संस्थापक के वंशज सुकेश तिवारी बताते हैं कि इस मंदिर कि एक खासियत ये भी है कि यहां से सामाजिक समरसता का संदेश भी दिया जाता है. मुगल काल से मंदिर की सुरक्षा में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग लगे हुए हैं. किसी को फूल की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी तो किसी को मंदिर के दीये के लिए तेल की व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी गई है. यानी अलग-अलग धर्म, जाति और वर्ग को जोड़कर रखने के लिए उन्हें मंदिर के कार्य की जिम्मेदारी दी जाती रही है.
वर्षा जल पर ही रहना पड़ता है निर्भर
झारखंड़ को अपनी जल की जरूरत पूरा करने के लिए वर्षा जल पर ही निर्भर रहना पड़ता है. राज्य में 1200 से 1400 mm बारिश होती है लेकिन सरफेस वाटर का 80 प्रतिशत और ग्राउंड वाटर का 74 प्रतिशत बर्बाद हो जाता है. राज्य में 24 में से 19 जिलों में ग्राउंड वाटर का अति दोहन होता है. लिहाजा वाटर लेवल नीचे जा चुका है. ऐसे में कम्युनिटी जल संरक्षण या वाटर हार्वेस्टिंग के तरीके ही पानी संकट से बचा सकती है. इस मुद्दे पर जागरूकता को लेकर भी बहस होते रहती है लेकिन रांची के बोड़ाया में 361 साल पुरानी मदन मोहन मंदिर में उसी वक्त से वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था थी. यानी 361 साल पहले के लोग पानी को बचाने को लेकर जागरूक थे. यह मंदिर अद्भुत वास्तु कला और पौराणिक मान्यताओं का प्रतीक तो है ही.