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मथुरा नहीं, यहां हुआ था रुक्मिणी हरण! कृष्ण के चरणों से जुड़ा है ये मंदिर, जन्माष्टमी पर उमड़ी भीड़

अमरावती का प्राचीन अंबादेवी मंदिर जन्माष्टमी के मौके पर श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बना हुआ है. धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण यहीं से रुक्मिणी को अपने साथ लेकर द्वारका की ओर रवाना हुए थे.

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Amaravati mandir Amaravati mandir

भगवान श्रीकृष्ण का नाम आते ही मथुरा, वृंदावन और द्वारका की याद आती है. लेकिन महाराष्ट्र के विदर्भ में एक ऐसा धार्मिक स्थल भी है, जिसका संबंध भगवान कृष्ण और माता रुक्मिणी की पौराणिक प्रेम कहानी से माना जाता है. अमरावती का प्राचीन अंबादेवी मंदिर जन्माष्टमी के मौके पर श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बना हुआ है. धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण यहीं से रुक्मिणी को अपने साथ लेकर द्वारका की ओर रवाना हुए थे.

राजा भीष्मक की बेटी थीं रुक्मिणी
पौराणिक कथा के अनुसार, रुक्मिणी विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थीं. वह मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं, लेकिन उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया था. रुक्मिणी इस विवाह के लिए तैयार नहीं थीं. उन्होंने एक ब्राह्मण के जरिए श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर उन्हें अपने साथ ले जाने का आग्रह किया.

कौंडण्यपुर से जुड़ी है रुक्मिणी हरण की कथा
अमरावती जिले का कौंडण्यपुर प्राचीन विदर्भ की राजधानी माना जाता है. स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, रुक्मिणी यहां अंबिका देवी के दर्शन के लिए पहुंची थीं. इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण वहां आए और उन्हें अपने साथ ले गए. मराठी विश्वकोश में भी कौंडण्यपुर का संबंध कृष्ण और रुक्मिणी की कथा से बताया गया है.

अंबादेवी मंदिर में पड़े थे कृष्ण के चरण
कृष्ण-रुक्मिणी की कथा का संबंध अमरावती शहर के अंबादेवी मंदिर से भी जोड़ा जाता है. मंदिर संस्थान की मान्यता के अनुसार, रुक्मिणी अपनी कुलदेवी अंबादेवी के दर्शन के लिए आई थीं. भगवान कृष्ण पहले से यहां मौजूद थे और यहीं से उन्हें अपने साथ लेकर द्वारका की ओर चले गए. धार्मिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण के पावन चरण इस मंदिर परिसर में पड़े थे.

जन्माष्टमी पर बढ़ जाता है मंदिर का महत्व
जन्माष्टमी के अवसर पर अंबादेवी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को झूले में विराजमान किया जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. इस दौरान कृष्ण-रुक्मिणी की पौराणिक कथा भी लोगों के बीच चर्चा का विषय रहती है. मथुरा को कृष्ण की जन्मभूमि, वृंदावन को उनकी बाल लीलाओं की भूमि और द्वारका को उनकी कर्मभूमि माना जाता है. वहीं विदर्भ का कौंडण्यपुर और अमरावती कृष्ण-रुक्मिणी की कथा से जुड़े महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं. यही वजह है कि जन्माष्टमी पर अमरावती का अंबादेवी मंदिर आस्था, इतिहास और पौराणिक परंपरा का खास संगम बन जाता है.

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