Kanwar Yatra
Kanwar Yatra
श्रावण की पावन कांवड़ यात्रा में आपने तरह-तरह की कांवड़ देखी होंगी, लेकिन बागपत से गुजर रही यह कांवड़ सिर्फ आस्था की नहीं, बल्कि बहू के संस्कार, सेवा और सास-ससुर के प्रति सम्मान की मिसाल बन गई है. दरअसल, कांवड़ के एक छोर पर पति रवि और दूसरे छोर पर पत्नी नीशू हैं. दोनों के कंधों पर एक ही कांवड़ और कदम से कदम मिलाकर 230 किलोमीटर का सफर. दोनों एक साथ अपने कंधों पर उसी कांवड़ का भार उठाकर आगे बढ़ते हैं.
बहू का अपने सास-ससुर के प्रति सम्मान और सेवा का संकल्प
रास्ता लंबा है, कंधों पर सैकड़ों लीटर गंगाजल का भार है, पैरों में थकान भी है, लेकिन दोनों का हौसला एक-दूसरे का सहारा बना हुआ है. श्रावण की कांवड़ यात्रा में बागपत से गुजर रही यह कांवड़ इसलिए खास है, क्योंकि इसके पीछे कोई मन्नत या मनौती नहीं, बल्कि एक बहू का अपने सास-ससुर के प्रति सम्मान और सेवा का संकल्प है. हरियाणा की रहने वाली नीशू अपने पति रवि के साथ हरिद्वार से गंगाजल लेकर करीब 230 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकली हैं. उनका मकसद है कि घर पहुंचकर इसी गंगाजल से अपने बुजुर्ग सास-ससुर को स्नान कराएं और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें.
गंगाजल लाकर माता-पिता को कराते रहेंगे स्नान
नीशू के लिए यह सिर्फ कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि रिश्तों को निभाने की यात्रा है. पति रवि पहले भी कांवड़ लाते रहे हैं, लेकिन इस बार नीशू ने भी उनके साथ चलने का फैसला किया. उन्होंने कांवड़ का एक हिस्सा अपने कंधे पर लिया और पति के साथ कदम से कदम मिलाकर निकल पड़ीं. नीशू कहती हैं कि उनके मन में आया कि जब पति हरिद्वार से गंगाजल लाकर माता-पिता को स्नान कराते हैं तो वह भी इस सेवा में उनका साथ दें. इसी सोच के साथ वह पति की हमसफर बनकर इस कठिन यात्रा पर निकल पड़ीं. रवि का कहना है कि उनके माता-पिता अभी घर पर हैं. वह उन्हें कांवड़ में बैठाकर यात्रा तो नहीं करा सकते, लेकिन जब तक मां-बाप के हाथ-पैर सलामत हैं, तब तक वह इसी तरह हरिद्वार से गंगाजल लाकर उन्हें स्नान कराते रहेंगे.
कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराने का है सपना
रवि ने बताया कि उनका सपना है कि आगे चलकर वह अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराएं. इस बार रवि की कांवड़ में सिर्फ गंगाजल नहीं है, बल्कि उसमें पत्नी नीशू का समर्पण भी शामिल है. दोनों की यह यात्रा बता रही है कि परिवार की जिम्मेदारी सिर्फ बेटे के कंधों पर नहीं होती, कभी-कभी एक बहू भी उसी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठाकर रिश्तों की खूबसूरती को नई पहचान दे देती है.