हनुमान अष्टक पाठ
हनुमान अष्टक पाठ
हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है. मान्यता है कि नियमित रूप से हनुमान अष्टक का पाठ करने से जीवन के कई कष्ट दूर होते हैं और मानसिक शांति मिलती है. शास्त्रों के अनुसार, इस पाठ से न सिर्फ आध्यात्मिक लाभ मिलता है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ती है.
हनुमान अष्टक क्या है?
हनुमान अष्टक भगवान हनुमान को समर्पित एक शक्तिशाली स्तुति है, जिसमें उनके पराक्रम, भक्ति और शक्ति का वर्णन किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इसका पाठ करने से भक्त के जीवन से संकट धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और आत्मविश्वास बढ़ता है.
हनुमान अष्टक के लाभ
1. संकटों से मिलती है मुक्ति
मान्यता के अनुसार, हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से जीवन में आने वाली बाधाएं और संकट कम होते हैं. इसे संकटमोचन स्तोत्र भी माना जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में मानसिक सहारा देता है.
2. मानसिक शांति और तनाव में राहत
धार्मिक विश्वास है कि इस पाठ से मन शांत रहता है और तनाव कम होता है. रोजाना इसका पाठ करने से नकारात्मक विचार दूर होते हैं और व्यक्ति अधिक सकारात्मक महसूस करता है.
3. आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि
हनुमान अष्टक का पाठ करने से व्यक्ति के अंदर साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है. मान्यता है कि इससे डर और असमंजस की स्थिति कम होती है और फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है.
4. नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा
हनुमान अष्टक का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों का प्रभाव कम होता है. इसे एक तरह की आध्यात्मिक सुरक्षा कवच माना जाता है.
5. जीवन में सकारात्मक बदलाव
नियमित पाठ से जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है. इससे कार्यों में सफलता मिलने की संभावना बढ़ती है और जीवन में संतुलन आता है.
पाठ करने के सही नियम
हनुमान अष्टक का पाठ सुबह या शाम शांत वातावरण में करना चाहिए. पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है. साथ ही मन को एकाग्र रखना जरूरी है ताकि पाठ का पूरा लाभ मिल सके. आप मंगलवार और शनिवार को खासकर यह पाठ जरूर करें.
संकट मोचन हनुमान अष्टक
बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारो .
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ..
देवन आनि करी विनती तब, छांड़ि दियो रवि कष्ट निहारो .
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो .. 1 ..
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो ..
चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिये कौन विचार विचारो .
कै द्घिज रुप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो .. 2 ..
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो .
जीवत न बचिहों हम सों जु, बिना सुधि लाए इहां पगु धारो .
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो .. 3 ..
रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो .
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो .
चाहत सीय अशोक सों आगि सु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो .. 4 ..
बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो .
लै गृह वैघ सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो .
आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो .. 5 ..
रावण युद्घ अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिरडारो .
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो .
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो .. 6 ..
बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो .
देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो .
जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समैत संहारो .. 7 ..
काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो .
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो .
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो .. 8 ..
.. दोहा ..
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर .
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ..