Eco-friendly cow dung Ganpati
Eco-friendly cow dung Ganpati
राजस्थान के पाली में एक दम्पती ने गणेश उत्सव को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की अनोखी पहल की है. यह दम्पती पिछले सात महीनों से गोबर से इको फ्रेंडली गणपति प्रतिमाएं तैयार कर रहा है. इन प्रतिमाओं की खासियत यह है कि पूजा के बाद इन्हें घर के गमले में ही विसर्जित किया जा सकता है. इससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहता है, बल्कि उसी मिट्टी में पौधा लगाकर हरियाली बढ़ाने का संदेश भी दिया जा रहा है. पाली से लेकर देश और विदेश तक इन प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ रही है.
सात महीने की मेहनत से तैयार होती है प्रतिमा
गणपति प्रतिमाएं बनाने का काम करीब सात महीने पहले शुरू हो जाता है. दम्पती पाली की गौशाला से गोबर लाकर उसे अच्छी तरह सुखाते हैं. इसके बाद गोबर को बारीक पीसकर पाउडर बनाया जाता है. इसमें बहुत कम पानी मिलाकर पेस्ट तैयार किया जाता है और उसे सांचे में भरकर गणपति की प्रतिमा बनाई जाती है.
धूप में सुखाकर दिया जाता है अंतिम रूप
सांचे से निकालने के बाद प्रतिमाओं को धूप में सुखाया जाता है. यदि कहीं दरार या क्रैक आ जाए तो उसकी मरम्मत की जाती है. इसके बाद पूरा परिवार मिलकर इको फ्रेंडली रंगों से मुकुट, सिंहासन, जनेऊ, दांत और अन्य सजावट करता है. कुछ प्रतिमाओं को मोती और डायमंड जैसी आकर्षक सजावट से भी संवारा जाता है. इस दौरान घर में गणेश भजन चलते रहते हैं और परिवार पूरी श्रद्धा से प्रतिमाओं को तैयार करता है.
हर प्रतिमा में दिखती है आस्था और संदेश
इस बार दम्पती ने साफा पहने हुए गणपति, आकर्षक सिंहासन वाले गणपति और छतरी वाले विशेष डिजाइन भी तैयार किए हैं. सभी प्रतिमाएं वजन में हल्की और पूरी तरह गोबर से बनी होती हैं.
पर्यावरण बचाने की अनोखी पहल
दम्पति का उद्देश्य लोगों को पीओपी की मूर्तियों की जगह गोबर से बनी इको फ्रेंडली गणपति प्रतिमाएं अपनाने के लिए प्रेरित करना है. उनका कहना है कि पूजा के बाद प्रतिमा का विसर्जन घर के गमले में किया जाए, जिससे गोबर मिट्टी में मिलकर पौधे के लिए खाद का काम करे और उसी स्थान पर नया पौधा लगाया जा सके. इससे गणपति का आशीर्वाद भी घर में बना रहेगा और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलेगा.
पाली में इन इको फ्रेंडली गणपति प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ रही है. यही वजह है कि देश के कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी इनके ऑर्डर मिल रहे हैं. हिन्दू धर्म में गाय और गोबर को पवित्र माना जाता है, इसलिए यह पहल आस्था और पर्यावरण संरक्षण का सुंदर संगम बनकर लोगों को आकर्षित कर रही है.
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