Pitru paksha 2026
Pitru paksha 2026
पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद कर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. इस दौरान जल अर्पित करने की भी एक खास विधि बताई गई है. आपने अक्सर देखा होगा कि पितरों को तर्पण देते समय जल हथेली के किसी सामान्य हिस्से से नहीं, बल्कि अंगूठे और तर्जनी के बीच से छोड़ा जाता है. आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और इस जगह को इतना खास क्यों माना गया है. चलिए हम आपको बताते हैं इसके पीछे की वजह...
2026 में कब से शुरू होगा पितृपक्ष?
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी. इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं.
अंगूठे और तर्जनी के बीच से क्यों देते हैं जल?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों को तर्पण देते समय जल अंगूठे और तर्जनी के बीच वाले हिस्से से अर्पित किया जाता है. हथेली के इस हिस्से को पितृ तीर्थ कहा जाता है. यही वजह है कि पितरों के लिए जल अर्पित करते समय हथेली के आगे के हिस्से की बजाय अंगूठे के पास के इस स्थान का इस्तेमाल किया जाता है.
हथेली में माने गए हैं चार तीर्थ
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को अलग तीर्थों से जोड़ा गया है.
देव तीर्थ: उंगलियों के ऊपरी हिस्से को देव तीर्थ माना जाता है. इसी भाग से देवताओं को अर्घ्य देने की परंपरा है.
ऋषि तीर्थ: कनिष्ठिका यानी छोटी उंगली के मूल भाग को ऋषि या प्रजापति तीर्थ माना जाता है.
ब्रह्म तीर्थ: हथेली के निचले हिस्से यानी कलाई के पास के भाग को ब्रह्म तीर्थ कहा जाता है.
पितृ तीर्थ: अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से को पितृ तीर्थ माना गया है. इसी कारण तर्पण में इस स्थान से जल छोड़ा जाता है.
पितृ पक्ष में तर्पण का क्या महत्व है?
पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का समय माना जाता है. इस दौरान लोग दिवंगत परिजनों को उनकी तिथि के अनुसार याद करते हैं और श्राद्ध कर्म करते हैं. तर्पण इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है. कई परिवारों में जल के साथ काले तिल का भी इस्तेमाल किया जाता है.
सर्वपितृ अमावस्या क्यों है खास?
पितृ पक्ष का आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या होता है. 2026 में यह 10 अक्टूबर को पड़ेगी. यह दिन उन पूर्वजों के लिए खास माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो. इस दिन तर्पण, श्राद्ध और दान करके पूर्वजों को याद करने की परंपरा है.
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