Purulia
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पुरुलिया जिले की पहचान बन चुके जेलेपाड़ा धीवर समिति के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में इस बार शताब्दी वर्ष का उत्सव खास अंदाज में मनाया जा रहा है. दक्षिण बंगाल के प्रमुख स्थायी दुर्गा मंदिरों में शुमार इस मंदिर की दुर्गा पूजा इस वर्ष 100वें वर्ष में प्रवेश कर गई है. शताब्दी वर्ष के मौके पर मंदिर को नए सिरे से सजाया और रंग-रोगन किया गया है.
मंदिर के पास इस बार विशेष थीम पर भव्य मंडप तैयार किया गया है. मंडप को गुजरात के प्रसिद्ध नीलकंठ धाम स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है. समिति के मुताबिक, जेलेपाड़ा धीवर समिति की पूजा में यह पहली बार है, जब थीम आधारित मंडप तैयार किया गया है. वहीं मां दुर्गा की प्रतिमा को पारंपरिक यानी सबेकियाना शैली में तैयार किया गया है. मंदिर और मंडप को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है. महालया के दिन से यहां बनारस के घाट की तर्ज पर विशेष संध्या आरती का आयोजन किया जा रहा है, जो एकादशी तक चलेगा. संध्या आरती देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं. पूजा के दिनों में दिन से लेकर देर रात तक मंदिर और मंडप परिसर में लोगों की भारी भीड़ देखी जा रही है. समिति के अनुसार, ग्रैंड ओपनिंग के बाद रात करीब 3 बजे तक श्रद्धालुओं का आना-जाना जारी रहा.
अपमान से शुरू हुई थी अपनी दुर्गा पूजा की कहानी
इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक संघर्ष की कहानी भी जुड़ी है. बताया जाता है कि करीब एक सदी पहले पुरुलिया शहर की एक सार्वजनिक दुर्गा पूजा में पूजा करने पहुंचे धीवर समुदाय के लोगों को कथित तौर पर जातिगत आधार पर अपमानित किया गया था. इस घटना के बाद समुदाय के लोगों ने तय किया कि वे अपनी पूजा और अपना मंदिर खुद बनाएंगे. इसके बाद पुरुलिया शहर के धीवर समाज के लोग एकजुट हुए. लोगों ने मंदिर निर्माण के लिए जमीन दान की और अपनी मेहनत की कमाई से पैसे जुटाए. इतना ही नहीं, समुदाय के लोग खुद निर्माण कार्य में मजदूर के रूप में भी जुट गए. धीरे-धीरे श्रम और सहयोग से एक विशाल स्थायी दुर्गा मंदिर का निर्माण हुआ. आज यही मंदिर आम लोगों के लिए भी आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है. हालांकि पूजा की पूरी व्यवस्था और संचालन की जिम्मेदारी अब भी धीवर समाज के लोग ही संभालते हैं.
दूसरे जिलों और राज्यों से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
हर साल यहां धूमधाम से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है. पूजा के दिनों में पुरुलिया जिले के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. पूजा के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है.
एकादशी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन
चंद्रचूड़ धीवर ने बताया कि उनके पूर्वजों के साथ हुए अपमान और उपेक्षा के बाद ही इस मंदिर के निर्माण की शुरुआत हुई थी. इस वर्ष यह पूजा 100वें वर्ष में प्रवेश कर गई है. उन्होंने बताया कि समिति आमतौर पर थीम पूजा नहीं करती, लेकिन शताब्दी वर्ष को खास बनाने के लिए पहली बार गुजरात के नीलकंठ धाम स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर थीम तैयार की गई है. ग्रैंड ओपनिंग के बाद श्रद्धालुओं की जबरदस्त भीड़ देखने को मिली और देर रात तक लोग मंडप देखने पहुंचते रहे.
रिपोर्टर: अनिल गिरी
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