Raisen Kamakhya Shaktipeeth
Raisen Kamakhya Shaktipeeth
नवरात्रि के नौ दिन साधना के माने जाते हैं. ऐसे में तांत्रिक शक्तिपीठों पर साधना का अलग महत्व होता है. रायसेन जिले में विंध्याचल पर्वत की तलहटी पर स्थित जामगढ़-भगदेई एक ऐसा स्थान है, जिसे त्रेता युग और द्वापर युग से जुड़ा माना जाता है. मान्यता है कि द्वापर युग में स्वामंतक मणि की खोज के दौरान भगवान श्रीकृष्ण यहां आए थे. यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण की ससुराल भी कहलाता है और यहां के लोग उन्हें अपना जामाता मानते हैं. यहीं मां कामाख्या का उपतांत्रिक शक्तिपीठ स्थित है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां के पुजारी रोज पूजा-पाठ के बाद अपना सिर काटकर मां को समर्पित करते थे. एक दिन ऐसी घटना हुई कि पुजारी दोबारा जीवित नहीं हुए. यह स्थान आज भी त्रेता और द्वापर युग से जुड़े साक्ष्यों और मान्यताओं के लिए जाना जाता है, जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवत में होने की बात कही जाती है.
विंध्याचल की तलहटी में स्थित है जामगढ़-भगदेई
जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर बरेली तहसील में विंध्याचल पर्वत की तलहटी पर जामगढ़-भगदेई गांव स्थित है. यहां जामवंत द्वारा स्थापित करीब 200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिवलिंग, जामवंत की गुफा और द्वापर युग में बनाया गया पाषाण शिवलिंग मंदिर है. इसी क्षेत्र के भगदेई गांव में प्राचीन मां कामाख्या का उपशक्ति पीठ मंदिर स्थित है. स्थानीय जानकार पंडित कमल यागवल्क्य के मुताबिक, यहां के पुजारी रोज पूजा-पाठ और आरती के बाद अपना सिर काटकर मां कामाख्या को समर्पित करते थे.
पुजारी के सिर अर्पित करने से जुड़ी है मान्यता
पंडित कमल यागवल्क्य ने बताया कि एक दिन मां ने अपने भक्त पुजारी से कहा कि अब कलियुग का चरण शुरू हो गया है. इसलिए वह अपना सिर काटकर उन्हें भेंट न करें. मां ने कहा कि पुजारी उनकी कृपा के पात्र हैं और उनका आशीर्वाद हमेशा उनके साथ रहेगा. हालांकि, मान्यता के अनुसार, एक दिन रोज की तरह पूजा और आरती करने के बाद पुजारी ने अपना सिर मां को अर्पित कर दिया, लेकिन इस बार वह दोबारा जीवित नहीं हुए. आज भी यहां तांत्रिक साधक तंत्र से जुड़े शोध और साधना करते हैं. मंदिर में प्राचीन मां कामाख्या की प्रसव अवस्था वाली मूर्ति भी स्थापित है. नवरात्रि के दौरान यहां तांत्रिक क्रियाएं और तंत्र साधना की जाती हैं. मान्यता है कि यह एक सिद्ध शक्तिपीठ है.
भगदेई और जामगढ़ नाम पड़ने के पीछे की मान्यता
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगदेई शब्द का संबंध योनि और शरीर से है. बताया जाता है कि 'भग' का अर्थ योनि है, जबकि 'देई' शब्द को देह का अपभ्रंश माना जाता है. इस तरह भगदेई नाम का संबंध योनि पूजन और मां कामाख्या की उपासना से जोड़ा जाता है. वहीं, जामगढ़ नाम को जामवंत के गढ़ यानी उनके गृह क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता है कि इसी वजह से इस स्थान का नाम जामगढ़ पड़ा.
शिव-शक्ति की उपासना का प्राचीन केंद्र माना जाता है जामगढ़-भगदेई
जामगढ़-भगदेई को शिव-शक्ति का क्रीड़ा स्थल माना जाता है. कई धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सती प्रसंग से जुड़ा महत्वपूर्ण विग्रह यहां मौजूद होने की मान्यता है. भगदेई नाम को लेकर एक धारणा यह भी है कि प्राचीन काल से ही यह क्षेत्र शिव और शक्ति की उपासना का केंद्र रहा है. असम के प्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर की तरह भगदेई में भी मां भगवती का अत्यंत प्राचीन देवी मठ है. इस मठ को शक्तिपीठ भी माना जाता है. यहां सदियों पुराना शिव मंदिर और जामवंत की गुफा भी स्थित है. कई विद्वानों और इतिहासकारों की मान्यता है कि आदिकाल से ही यह क्षेत्र शिव और शक्ति की उपासना से जुड़ा रहा है. बताया जाता है कि भगदेवी शब्द का अपभ्रंश होते-होते भगदेई और जाम्बगढ़ का अपभ्रंश होते-होते जामगढ़ हो गया.
चमत्कारों के लिए विख्यात है देवी मठ
किंवदंती के अनुसार, इस देवी मठ में सैकड़ों वर्ष पहले ऐसे पुजारी साधना किया करते थे, जो मां की पूजा के बाद अपना शीश उनके चरणों में अर्पित कर देते थे. मान्यता है कि देवी मां के अनुग्रह से वे फिर से जीवित हो जाते थे. कहा जाता है कि एक बार देवी मां ने पुजारी से कहा कि अब उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है. लेकिन उनका हठी भक्त नहीं माना. उसने मां से कहा कि यदि उन्हें कष्ट होता है, तो उसे भी अब जीवन की आवश्यकता नहीं है. किंवदंती के मुताबिक, एक दिन अनुष्ठान के बाद पुजारी ने फिर वही क्रिया की और अपना शीश हमेशा के लिए देवी मां के चरणों में अर्पित कर दिया.
ये भी पढ़ें