श्री सांवलिया सेठ
श्री सांवलिया सेठ
मेवाड़ की पावन धरा पर विराजमान प्रसिद्ध कृष्णधाम श्री सांवलिया सेठ के दरबार में श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला है. सांवरे सरकार के प्रति भक्तों की अटूट आस्था एक बार फिर उस समय साकार हुई, जब आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के पावन अवसर पर खोले गए भंडार की पांच चरणों में हुई गणना के अंतिम आंकड़े सामने आए.
भगवान श्री सांवलिया सेठ के खजाने में देश-विदेश के श्रद्धालुओं ने दिल खोलकर भेंट अर्पित की. इससे जिससे कुल चढ़ावा 31 करोड़ 17 लाख 92 हजार 129 रुपए तक पहुंच गया. भंडार की नकद राशि की गणना में कुल 23 करोड़ 58 लाख 44 हजार 818 रुपए प्राप्त हुए. दानपेटी के अलावा भेंटकक्ष, मनीऑर्डर और ऑनलाइन मिले दान सहित कुल 31 करोड़ 17 लाख 92 हजार 129 रुपए का चढ़ावा आया. गिनती पूरी होने के बाद मंदिर मंडल ने अंतिम आंकड़े जारी किए.
पांच चरणों में की गई गणना में मिले इतने रुपए
पहले चरण में 9 करोड़ 35 लाख 65 हजार 100 रुपए, दूसरे चरण में 5 करोड़ 94 लाख 35 हजार रुपए, तीसरे चरण में 6 करोड़ 10 लाख 12 हजार रुपए, चौथे चरण में 1 करोड़ 74 लाख 10 हजार रुपए, पांचवें और अंतिम चरण में 44 लाख 22 हजार 718 रुपए की गणना की गई.
सोना-चांदी और विदेशी मुद्रा
नकदी के साथ सांवरे सेठ के चरणों में सोना-चांदी और विदेशी मुद्रा भी श्रद्धापूर्वक अर्पित की गई. भंडार एवं भेंटकक्ष से प्राप्त विवरण के अनुसार कुल 930 ग्राम 100 मिलीग्राम सोना, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपए है. 92 किलो 242 ग्राम 320 मिलीग्राम चांदी, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 2 करोड़ रुपए बताई गई है, प्राप्त हुई. इसके साथ ही कुवैत, कतर, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, भूटान, कनाडा, थाईलैंड, नेपाल, जॉर्डन, रवांडा, कोरिया, जॉर्जिया, घाना, इंग्लैंड, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, चीन सहित 19 देशों की विदेशी मुद्रा भी भगवान के चरणों में समर्पित की गई. इसका भारतीय मुद्रा में अनुमानित मूल्य करीब 2 लाख 15 हजार 700 रुपए है.
सांवरे सरकार के प्रति भक्तों के अटूट विश्वास
यह चढ़ावा केवल धनराशि का आंकड़ा नहीं, बल्कि सांवरे सरकार के प्रति भक्तों के अटूट विश्वास, मनोकामनाओं, कृतज्ञता और समर्पण की भावना का प्रतीक है. श्री सांवलिया सेठ के दरबार में उमड़ती श्रद्धा यह संदेश देती है कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और सांवरे के भक्त दुनिया के किसी भी कोने में हों, उनका मन अपने आराध्य के चरणों में ही बसता है.