Festival of Vijayadashami was Celebrated with Great Enthusiasm in Khilchipur
Festival of Vijayadashami was Celebrated with Great Enthusiasm in Khilchipur
राजगढ़ जिले के खिलचीपुर में विजयादशमी का पर्व सिर्फ रावण दहन नहीं, बल्कि 90 साल पुरानी परंपरा, आस्था और जीवंत रामायण का विराट उत्सव बन गया. मंगलवार को पटवा बाजार से दशहरा मैदान तक निकले भव्य समारोह में 450 से ज्यादा पात्रों ने रामायण के अलग-अलग किरदार निभाए. सड़कों पर कहीं रावण की सेना तलवारें लहराती नजर आईं तो कहीं रामदल के साथ जय श्रीराम के जयकारे गूंजे. शबरी भगवान श्रीराम को चख-चखकर बेर खिलाती नजर आईं, सांवरिया सेठ और तिरुपति बालाजी के दिव्य स्वरूप दिखाई दिए, वहीं भरत के भावपूर्ण संवादों ने लोगों का ध्यान खींचा. मध्यप्रदेश और राजस्थान के कई शहरों से हजारों लोग खिलचीपुर के इस अनूठे दशहरे को देखने पहुंचे थे.
राम-लक्ष्मण-हनुमान की आरती से निकला भव्य रामदल
पटवा बाजार स्थित श्रीराम मंदिर में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान की आरती के साथ आयोजन का शुभारंभ हुआ. पूर्व मंत्री एवं खिलचीपुर राजघराने के सदस्य प्रियव्रत सिंह तथा विधायक हजारीलाल दांगी ने आरती उतारी. इसके बाद बैंड-बाजों और जय श्रीराम के जयघोष के बीच शोभायात्रा दशहरा मैदान की ओर रवाना हुई. सबसे आगे रावण की सेना के राक्षस तलवारें लहराते हुए चल रहे थे. इसके बाद सुपर्णखा के पुतले, मेघनाद यज्ञ, कुंभकर्ण, रावण और उसकी असुरी सेना के पात्र दिखाई दिए. रथ पर रावण सवार था और उसके पीछे भगवान श्रीराम, लक्ष्मण व हनुमान का रथ चल रहा था.
भरत के संवाद ने बांधा समां
शोभायात्रा में शबरी-राम मिलन का प्रसंग बेहद भावुक रहा. शबरी भगवान श्रीराम को प्रेम से एक-एक बेर चख-चखकर खिलाती नजर आईं. वहीं श्रीनाथजी, सांवरिया सेठ और तिरुपति बालाजी के भव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने. भरत के संवादों को भी विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया. भरत के भावपूर्ण प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को रामायण के उस दौर से जोड़ दिया, जहां भाई के प्रति त्याग, प्रेम और समर्पण की मिसाल दिखाई देती है. इसके अलावा नीम करौली बाबा, श्रीराम दरबार, बाल हनुमान, हनुमान दल और भरत-कैकेयी संवाद सहित अनेक झांकियों ने शोभायात्रा को भव्यता दी.
पुल बना रामसेतु, नदी पार कर दशहरा मैदान पहुंचा रामदल
खिलचीपुर की भौगोलिक स्थिति इस आयोजन को और खास बनाती है. नगर का एक हिस्सा नदी के इस पार और सोमवारिया स्थित दशहरा मैदान दूसरी ओर है शोभायात्रा नदी के पुल पर पहुंची, जहां रामसेतु का दृश्य प्रस्तुत किया गया. भगवान श्रीराम ने यहां रामेश्वर की पूजा-अर्चना की. इसके बाद रामदल नदी पार कर दशहरा मैदान पहुंचा. यहां राम और रावण की सेनाएं आमने-सामने हुईं. युद्ध का भव्य मंचन हुआ और अंत में भगवान श्रीराम ने तीर चलाकर रावण का वध किया.
रावण के 10 सिर जले तो गूंज उठा खिलचीपुर
रावण का पुतला धू-धू कर जलने लगा और देखते ही देखते आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाजी से जगमगा उठा. रावण के दस सिर एक के बाद एक तेज धमाकों के साथ फूटे. मैदान में मौजूद करीब एक लाख लोगों ने एक साथ जय श्रीराम के जयकारे लगाए तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया.
51 रुपए से शुरू हुई परंपरा आज बन गई आस्था का विराट उत्सव
बजरंग समिति के सदस्य जितेंद्र सेन के मुताबिक, 1936 में बजरंग समिति ने दशहरा उत्सव की व्यवस्थित शुरुआत की थी. उस समय राजपरिवार के सहयोग से महज 51 रुपए के बजट में आयोजन होता था. रियासत काल में घोड़े, हाथी, नगाड़े और रियासत की सवारी भी दशहरे का हिस्सा होती थी. समय के साथ यह परंपरा लगातार भव्य होती गई. करीब नौ दशक बाद खिलचीपुर का दशहरा आज सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि रामभक्ति, सनातन संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का ऐसा विराट उत्सव बन चुका है, जिसे देखने मध्यप्रदेश और राजस्थान से हर साल हजारों लोग खिंचे चले आते हैं. बता दे कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था संभाली. एसपी अमित तोलानी अपने परिवार के साथ दशहरा देखने पहुंचे थे. वही SDM ज्योति राजोरे, एसडीओपी धर्मवीर नागर, थाना प्रभारी कमल सिंह गहलोत पुलिसकर्मी मैदान में भीड़ को व्यवस्थित रखने में जुटे रहे.