मां लक्ष्मी ने बांधी विष्णु भगवान को राखी
मां लक्ष्मी ने बांधी विष्णु भगवान को राखी
मां लक्ष्मी के बिना भगवान विष्णु अधूरे हैं, तो भगवान हरि के बिना मां लक्ष्मी भी व्याकुल हो जाती हैं. कहते हैं, जहां भगवान विष्णु हैं, वहीं माता लक्ष्मी भी वास करती हैं. शास्त्रों में दोनों का रिश्ता सिर्फ पति-पत्नी का नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व से जुड़ा बताया गया है. अनंतकाल से दोनों वैकुंठ में निवास करते आ रहे हैं. कहा जाता है कि वैकुंठ दोनों का घर है. हालांकि कई ऐसी घटनाओं का जिक्र भी पुराणों में देखने को मिलता है जब दोनों को एक दूसरे का वियोग सहना पड़ा. ऐसी ही एक घटना का उल्लेख मिलता है जब मां लक्ष्मी को भगवान से कई वर्षों तक अलग रहना पड़ा था.
लेकिन जब वियोग कि अग्नि मां को सता रही थी, तब उनको अपने ही पति भगवान विष्णु को पाताल लोक से वापस लाने के लिए दानवों के राजा बलि को राखी बांधनी पड़ी. कहानी उस समय की है, जब दानवराज बली ने भगवान विष्णु से ऐसा वचन पा लिया था, जिसके बाद हरि को कुछ समय के लिए उसके लोक में रहना पड़ा.
राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न हुए भगवान विष्णु
राजा बलि दानव कुल में जन्मे थे और भक्त प्रहलाद के पोते थे. दानवों के कुल से होते हुए भी उनका आचरण अपने दादा जैसा भक्ति का था. वह भी भगवान विष्णु के बड़े भक्तों में गिने जाते हैं. उनकी दानशीलता और भक्ति की चर्चा तीनों लोकों में होती थी. जब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर चालाकी से राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी, तो बलि ने बिना संकोच उन्हें दे डाला.
दरअसल इंद्र के याचना करने पर भगवान विष्णु ने भगवान वामन का रूप धर बलि से तीन पग स्थान मांगा. बलि को लगा नन्हे पैर से वह कितनी ही धरती का हिस्सा ले लेंगे. हालांकि राजा बलि भगवान की लीला से अंजान थें. भगवान वामन में अपना रूप अत्यंत विशाल किया और दो पग में पृथ्वी और आकाश नाप लिया. तीसरे पग के लिए जब कुछ शेष नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान वामन के आगे झुका दिया. भगवान श्री हरि उनकी भक्ति और वचन निभाने की भावना से बहुत प्रसन्न हुए.
बलि ने भगवान विष्णु से मांगा अनोखा वरदान
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान देने की इच्छा जताई. तब बलि ने भगवान से अपने साथ रहने का आग्रह कर दिया. भक्त की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु उसके साथ पाताल लोक चले गए. इधर माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के लंबे समय तक वापस न आने से चिंतित हो गईं. उनके लिए भगवान हरि से दूर रहना आसान नहीं था. अब उन्हें ऐसा रास्ता चाहिए था, जिससे भगवान विष्णु को वापस लाया जा सके.
मां लक्ष्मी ने लिया एक बहन का रूप
कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंचीं. वहां उन्होंने राजा बलि को अपना भाई बनाया. माता लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर राखी बांधी और उसके सुख-समृद्धि की कामना की. राखी बांधने के बाद बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा.
राखी के बदले मांगा भगवान विष्णु को
राजा बलि ने जब बहन से उपहार मांगने को कहा तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को ही अपना उपहार बताया. यह सुनकर बलि समझ गए कि जिसने उन्हें राखी बांधी है वह कोई साधारण स्त्री नहीं है, बल्कि वहीं विष्णु पत्नी मां महा लक्ष्मी हैं और अपने पति को मांगने आई हैं. कथा के अनुसार, बलि ने अपनी बहन की इच्छा स्वीकार कर ली और भगवान विष्णु को उनके साथ वापस जाने की आज्ञा दे डाली.
इसी कथा से जुड़ी है रक्षाबंधन की मान्यता
पौराणिक मान्यता में इस कथा को भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता से जोड़ा जाता है. इसमें राखी सिर्फ एक धागा नहीं रह जाती, बल्कि कच्चे धागे में सिमटा विश्वास, अपनापन और रक्षा के वचन का प्रतीक बन जाती है. माता लक्ष्मी और राजा बलि की यह कथा यह भी बताती है कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते. विश्वास और सम्मान से बना रिश्ता भी उतना ही मजबूत हो सकता है. यह भी एक बड़ा कारण है, जिसके चलते रक्षाबंधन के मौके पर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी इस पौराणिक कथा को याद किया जाता है.
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