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Sawan 2026: सावन में जानिए भगवान शिव के पहले ज्योतिर्लिंग की कहानी, आखिर क्यों सोमनाथ को मिला सबसे पहला स्थान?

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले स्थान पर आने वाले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी. आखिर क्यों इसे पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक मान्यता जुड़ी है.

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Somanth Temple Story Somanth Temple Story
हाइलाइट्स
  • भगवान शिव के पहले ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की अद्भुत कहानी

  • चंद्रदेव के श्राप से मुक्ति की कहानी से जुड़ा है सोमनाथ

आज सावन का पहला सोमवार है. साल 2026 में सावन का महीना 30 जुलाई से 28 अगस्त तक है. शिवभक्तों के लिए सावन का हर सोमवार बेहद शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है. ऐसे पावन अवसर पर आइए जानते हैं भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले स्थान पर आने वाले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी. आखिर क्यों इसे पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक मान्यता जुड़ी है.

चंद्रदेव को मिले श्राप से जुड़ी है सोमनाथ की कहानी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों से हुआ था. लेकिन चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से केवल रोहिणी को अधिक प्रेम करते थे. इससे अन्य पुत्रियां दुखी हो गईं और उन्होंने अपने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत की.

दक्ष ने क्रोधित होकर चंद्रदेव को तेजहीन होने का श्राप दे दिया. श्राप के प्रभाव से चंद्रमा का प्रकाश धीरे-धीरे समाप्त होने लगा. संकट से घबराकर चंद्रदेव ने ब्रह्माजी से उपाय पूछा. ब्रह्माजी ने उन्हें प्रभास तीर्थ जाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करने की सलाह दी.

कई सालों की तपस्या के बाद भगवान शिव प्रसन्न हुए और चंद्रदेव को श्राप से आंशिक मुक्ति का वरदान दिया. तभी से चंद्रमा घटता और बढ़ता है. इसी घटना के कारण भगवान शिव यहां सोमनाथ यानी सोम (चंद्र) के नाथ के रूप में विराजमान हुए.

इसीलिए माना जाता है पहला ज्योतिर्लिंग
शिव पुराण में भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि वे 12 विशेष स्थानों पर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं. इनमें सोमनाथ को पहला ज्योतिर्लिंग माना गया है. मान्यता है कि यहीं भगवान शिव पहली बार ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे. इसलिए द्वादश ज्योतिर्लिंगों की लिस्ट की शुरुआत सोमनाथ से होती है.

सोमनाथ मंदिर का इतिहास हजारों नहीं, युगों पुराना माना जाता है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले चंद्रदेव ने सोने का मंदिर बनवाया था. इसके बाद रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया और बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से मंदिर का निर्माण कराया.

वैदिक परंपराओं से जुड़े शोधों में उल्लेख मिलता है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पहली प्राण-प्रतिष्ठा त्रेतायुग के दौरान श्रावण शुक्ल तृतीया को हुई थी. इसी कारण यह मंदिर सनातन परंपरा में अत्यंत प्राचीन और आस्था का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है.

कई बार टूटा, हर बार फिर खड़ा हुआ सोमनाथ
11वीं से 18वीं शताब्दी के बीच सोमनाथ मंदिर पर कई बार विदेशी आक्रमण हुए और इसे बार-बार तोड़ा गया. लेकिन हर बार श्रद्धालुओं और शासकों ने इसे फिर से भव्य रूप में खड़ा किया.

आज दिखाई देने वाला भव्य सोमनाथ मंदिर सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प का परिणाम है. आजादी के बाद 13 नवंबर 1947 को उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया. इसके बाद 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की.

समुद्र किनारे बसा है आस्था का यह भव्य धाम
गुजरात के अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर अपनी धार्मिक महत्ता के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां का सूर्यास्त श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देता है. मंदिर परिसर में वल्लभ घाट, कपर्दी विनायक मंदिर और हनुमान मंदिर भी दर्शन के प्रमुख केंद्र हैं.

अहिल्याबाई होल्कर ने भी निभाई परंपरा
मुख्य मंदिर के पास स्थित अहिल्याबाई मंदिर का निर्माण 1782 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था. माना जाता है कि कठिन राजनीतिक परिस्थितियों के दौरान भी इस मंदिर ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना की परंपरा को निरंतर बनाए रखा. आज भी श्रद्धालु मुख्य सोमनाथ मंदिर के साथ इस मंदिर के भी दर्शन करते हैं.

सावन सोमवार के व्रत का महत्व
सावन महीना भगवान शिव को समर्पित है और इस महीने के सोमवार पूजा-पाठ के नजरिए से बहुत शुभ माने जाते हैं. मान्यता है कि सोमवार को शिव पूजा करने से जीवन की परेशानियां दूर होने लगती हैं और घर में सुख-शांति बनी रहती है. मान्यता है कि सावन सोमवार का व्रत और पूजा जल्दी फल देने वाले माने जाते हैं.