
Omkareshwar Jyotirlinga: Photo: /shriomkareshwar.org/
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आज सावन का आखिरी सोमवार है. देशभर के शिव मंदिरों में भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजा-अर्चना कर रहे हैं. 12 ज्योतिर्लिंगों में चौथे ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन का भी इस दिन विशेष महत्व माना जाता है. मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के बीच स्थित मंधाता यानी शिवपुरी द्वीप पर बना यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ अपनी अनोखी भौगोलिक बनावट के लिए भी प्रसिद्ध है. मान्यता है कि नर्मदा की दो धाराओं के बीच बना यह द्वीप ऊपर से देखने पर ॐ के आकार का दिखाई देता है. यही वजह है कि इसे ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है.
नर्मदा की दो धाराओं के बीच बसा है मंदिर
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है. यह इंदौर से करीब 77 किलोमीटर और मोरटक्का से करीब 13 किलोमीटर दूर है. यहां नर्मदा नदी दो धाराओं में बंट जाती है और इनके बीच मंधाता या शिवपुरी नाम का द्वीप बनता है. करीब 4 किलोमीटर लंबे और 2 किलोमीटर चौड़े इस द्वीप का आकार ॐ जैसा है. भक्त नर्मदा में स्नान करने के बाद ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं.
विंध्य पर्वत की तपस्या से जुड़ी है कहानी
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने की कई पौराणिक कथाएं मिलती हैं. इनमें एक कथा विंध्य पर्वत की तपस्या से जुड़ी है. मान्यता है कि विंध्य पर्वत ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था. उसने शिवलिंग बनाकर भगवान की पूजा की. तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां प्रकट हुए और विंध्य पर्वत को आशीर्वाद दिया. इसी दौरान भगवान शिव के प्राणव यानी ॐ स्वरूप से जुड़े लिंग की स्थापना हुई. इसी कारण यहां विराजमान भगवान को ओंकारेश्वर कहा गया. एक अन्य मान्यता के अनुसार देवताओं की प्रार्थना पर शिवलिंग दो रूपों में प्रकट हुआ. इनमें एक ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर या अमरेश्वर के रूप में माना जाता है.
राजा मांधाता ने भी की थी यहां तपस्या
ओंकारेश्वर से जुड़ी एक और कथा इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधाता से जुड़ी है. कहा जाता है कि राजा मांधाता ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन दिए और उन्हें आशीर्वाद दिया. राजा मांधाता की तपस्या के कारण ही इस क्षेत्र को मंधाता या शिवपुरी नाम से भी जाना जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु नर्मदा किनारे पूजा के साथ भगवान शिव का अभिषेक भी करते हैं.

मंदिर की बनावट भी है खास
ओंकारेश्वर मंदिर उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली में बना है. मंदिर का ऊंचा शिखर दूर से ही दिखाई देता है. मंदिर का गर्भगृह पुराने स्थापत्य की झलक देता है. मंदिर में एक बड़ा सभा मंडप है, जो करीब 14 फीट ऊंचा है. इसे 60 बड़े स्तंभों का सहारा दिया गया है. मंदिर में पांच मंजिलें हैं और हर मंजिल पर अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. इनमें श्री ओंकारेश्वर, श्री महाकालेश्वर, श्री सिद्धनाथ और श्री गुप्तेश्वर प्रमुख हैं. सबसे ऊपर ध्वजधारी देवता का स्थान है.
तीनों समय होती है अलग-अलग पूजा
ओंकारेश्वर मंदिर में रोज तीन प्रमुख पूजाएं होती हैं. सुबह की पूजा मंदिर ट्रस्ट की ओर से कराई जाती है. दोपहर की पूजा सिंधिया परिवार के पुजारियों द्वारा और शाम की पूजा होलकर परिवार के पुजारियों द्वारा होती है. सावन और दूसरे बड़े त्योहारों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है.
हर सोमवार निकलती है भगवान की पालकी
ओंकारेश्वर में हर सोमवार भगवान शिव की पालकी निकालने की परंपरा है. भगवान ओंकारेश्वर की तीन मुख वाली प्रतिमा को सोने की पालकी में विराजमान किया जाता है. ढोल और मंजीरों के साथ यह पालकी नर्मदा किनारे पूजा के बाद नगर के अलग-अलग हिस्सों से गुजरती है. सावन के सोमवार को यह आयोजन और भी खास हो जाता है. पालकी के दौरान भक्त भगवान शिव के जयकारे लगाते हैं और भक्ति में झूमते नजर आते हैं.
तीनों लोकों का भ्रमण कर यहां विश्राम करते हैं शिव
ओंकारेश्वर से जुड़ी मान्यता के अनुसार भगवान शिव रोज तीनों लोकों का भ्रमण करने के बाद यहां विश्राम करते हैं. इसी विश्वास के कारण मंदिर में भगवान शिव के लिए विशेष शयन व्यवस्था और शयन दर्शन की परंपरा है. स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी ओंकारेश्वर की महिमा का उल्लेख मिलता है.