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काशी में होली की शुरुआत, हरिश्चंद्र घाट पर चिता-भस्म से खेली गई होली

रंगभरी एकादशी के अवसर पर महाश्मशान हरिश्चंद्र घाट पर जलती चिताओं के बीच डमरू, घंट, घड़ियाल, ढोल-ताशे और मृदंग की गूंज सुनाई दी.

Varanasi Masan Holi Varanasi Masan Holi

देश-दुनिया में जहां लोग रंग और गुलाल से होली खेलते हैं, वहीं काशी में इस पर्व की शुरुआत एक अनोखी परंपरा से होती है. यहां काशीवासी सबसे पहले अपने इष्ट भोले बाबा के साथ महाश्मशान पर चिता-भस्म की होली खेलते हैं. इसके बाद ही शहर में रंगों का उत्सव शुरू माना जाता है.

रंगभरी एकादशी पर हरिश्चंद्र घाट पर होली
रंगभरी एकादशी के अवसर पर महाश्मशान हरिश्चंद्र घाट पर जलती चिताओं के बीच डमरू, घंट, घड़ियाल, ढोल-ताशे और मृदंग की गूंज सुनाई दी. चारों ओर उड़ता गुलाल और चिता की भस्म इस अनूठी होली के साक्षी बने. मोक्षदायिनी काशी के इस घाट पर सालभर चिताएं जलती रहती हैं, लेकिन वर्ष में एक दिन यहां मातम के बीच उत्सव का रंग भी दिखता है.

प्राचीन मान्यता से जुड़ी है परंपरा
मान्यता के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराकर काशी लौटे थे और काशीवासियों के साथ होली खेली थी. हालांकि वे अपने गणों, भूत, प्रेत, पिशाच और अघोरियों के साथ होली नहीं खेल सके. तभी से परंपरा चली कि वे अपने प्रिय श्मशान पर आकर गणों के साथ चिता-भस्म की होली खेलते हैं.

पंचदिवसीय होली पर्व की यह पहली कड़ी मानी जाती है. इसकी शुरुआत हरिश्चंद्र घाट पर महाश्मशान नाथ की पूजा और आरती से होती है. इससे पहले बाबा की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जो वाराणसी के कीनाराम आश्रम से निकलकर महाश्मशान तक पहुंचती है.

देश-विदेश से जुटते हैं श्रद्धालु
इस अद्भुत होली के साक्षी बनने के लिए देशभर से श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं. विदेशी पर्यटक भी इस परंपरा को देखने आते हैं और भारतीय संस्कृति की अनूठी झलक देखकर अभिभूत हो जाते हैं. भूत-प्रेत और गणों के साथ बाबा की इस मसान होली के बाद ही काशी में रंगों का असली उत्सव शुरू होता है. आस्था, परंपरा और अध्यात्म से जुड़ी यह होली काशी की पहचान बन चुकी है.