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Shani Dev: आखिर शनिवार के दिन ही क्यों की जाती है शनिदेव की पूजा? कुंडली से शनि दोष दूर करने के लिए करें न्याय के देवता के इन 108 नामों का जाप

Shani Dev 108 Names: शनिदेव को न्याय का देवता और कर्मों का फल देने वाला कर्मफल दाता कहा जाता है. आज हम आपको बता रहे हैं आखिर शनिवार के दिन शनिदेव की क्यों पूजा की जाती है और कुंडली से शनि दोष को दूर करने के लिए शनि महाराज के किन नामों का जाप करना चाहिए?

Shani Dev Shani Dev

हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित है. शनिवार (Saturday) के दिन न्याय के देवता और कर्मों का फल देने वाला कर्मफल दाता शनिदेव (Shani Dev) की पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान शनि की पूजा शास्त्रों में चमत्कारी मानी गई है.आज हम आपको बता रहे हैं आखिर शनिवार के दिन शनिदेव की क्यों पूजा की जाती है और कुंडली से शनि दोष को दूर करने के लिए शनि महाराज के किन नामों का जाप करना चाहिए? 

आपको मालूम हो कि शनिदेव के गुरु महादेव हैं. भोलेनाथ से ही शनिदेव को यह वरदान मिला हुआ है कि वह हर किसी व्यक्ति को उनके कर्मों के अनुसार फल दें. शनि महाराज को निर्णायक ग्रह कहा जाता है. शनि देव की प्रकृति उग्र मानी जाती है, जो कि अपना तत्काल प्रभाव दिखाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि यदि शनिदेव की टेढ़ी नजर किसी के ऊपर पड़ जाए तो उस व्यक्ति पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ता है. कई बीमारियां अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं. मानसिक पीड़ा का दौर शुरू हो जाता है. 

शनिवार के दिन क्यों की जाती है शनिदेव की पूजा 
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा करने से भक्त के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आती है. हर कष्ट दूर हो जाते हैं. शनिवार के दिन पूजा करने से शनिदेव की कृपा भक्त पर बनी रहती है. यदि किसी की कुंडली में शनि कमजोर स्थिति में है, महादशा का साया है या फिर जीवन में कोई और परेशानी है तो इन सभी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा की जाती है. शनिवार की शाम जो भक्त पीपल के पेड़ के समक्ष सरसों के तेल का दीया जलाते हैं और शनिदेव के 108 नामों का जाप करते हैं, उनका कल्याण होता है. कुंडली से शनि दोष भी समाप्त हो जाता है. 

शनिदेव की दृष्टि क्यों मानी जाती है अशुभ
शनिदेव की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक कथाएं हैं. एक पौराणिक कथा के मुताबिक सूर्य का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या संज्ञा से हुआ था. संज्ञा से यम, यमुना और मनु पैदा हुए. सूर्यदेव का तेज उनकी पत्नी संज्ञा ज्यादा दिन तक सह नहीं पाईं. ऐसे में संज्ञा अपनी छाया को सूर्यदेव की सेवा में छोड़कर चली गईं. कुछ दिनों बाद छाया से शनिदेव का जन्म हुआ. पौराणिक कथा के अनुसार शनिदेव को श्राप मिला हुआ है कि वह जिस भी किसी को देखेंगे उसका अनिष्ट हो जाएगा. यह श्राप शनिदेव की पत्नी ने दिया है.

दरअसल, शनिदेव का विवाह चित्रा रथ नामक गंधर्व से हुआ था, जो स्वभाव से काफी उग्र थीं. शनिदेव जब एक बार भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर रहे थे, तब शनिदेव की पत्नी मिलन की कामना करने से शनिदेव के पास पहुंचीं. शनिदेव उस समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में इतने लीन थे कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि चित्रा रथ उनसे मिलने आईं हैं. शनिदेव का जब ध्यान भंग हुआ तब उनकी पत्नी का रितु काल समाप्त हो चुका था. इससे क्रोधित होकर शनिदेव की पत्नी ने उन्हें श्राप दिया कि पत्नी होने पर भी आपने मुझे कभी प्रेम की दृष्टि से नहीं देखा. अब आप जिसे भी देखेंगे उसका बुरा होगा. इसी कारण शनि की दृष्टि में दोष माना जाता है.

कुंडली से शनि दोष को दूर करने के लिए करें शनिदेव के इन नामों का जप
ऊँ शनैश्चराय नमः, ऊँ वरेण्याय नमः, ऊँ शान्ताय नमः, ऊँ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः, ऊँ शरण्याय नमः, ऊँ सर्वेशाय नमः, ऊँ सौम्याय नमः, ऊँ सुरवन्द्याय नमः, ऊँ सुरलोकविहारिणे नमः, ऊँ सुखासनोपविष्टाय नमः, ऊँ सुन्दराय नमः, ऊँ घनाय नमः, ऊँ घनरूपाय नमः, ऊँ घनाभरणधारिणे नमः, ऊँ घनसारविलेपाय नमः, ऊँ खद्योताय नमः, ऊँ मन्दाय नमः, ऊँ मन्दचेष्टाय नमः, ऊँ महनीयगुणात्मने नमः, ऊँ मर्त्यपावनपदाय नमः, ऊँ महेशाय नमः, ऊँ छायापुत्राय नमः, ऊँ शर्वाय नमः, ऊँ शततूणीरधारिणे नमः, ऊँ चरस्थिरस्वभा वाय नमः, ऊँ अचञ्चलाय नमः, ऊँ नीलवर्णाय नम:, ऊँ नित्याय नमः, ऊँ नीलाञ्जननिभाय नमः, ऊँ नीलाम्बरविभूशणाय नमः, ऊँ निश्चलाय नमः, ऊँ वेद्याय नमः, ऊँ विधिरूपाय नमः, ऊँ विरोधाधारभूमये नमः, ऊँ भेदास्पदस्वभावाय नमः, ऊँ वज्रदेहाय नमः, ऊँ वैराग्यदाय नमः, ऊँ वीराय नमः, ऊँ वीतरोगभयाय नमः, ऊँ विपत्परम्परेशाय नमः, ऊँ विश्ववन्द्याय नमः, ऊँ गृध्नवाहाय नमः, ऊँ गूढाय नमः, ऊँ कूर्माङ्गाय नमः, ऊँ कुरूपिणे नमः, ऊँ कुत्सिताय नमः, ऊँ गुणाढ्याय नमः, ऊँ गोचराय नमः, ऊँ अविद्यामूलनाशाय नमः, ऊँ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः, ऊँ आयुष्यकारणाय नमः, ऊँ आपदुद्धर्त्रे नमः, ऊँ विष्णुभक्ताय नमः, ऊँ वशिने नमः, ऊँ विविधागमवेदिने नमः, ऊँ विधिस्तुत्याय नमः, ऊँ वन्द्याय नमः, ऊँ विरूपाक्षाय नमः, ऊँ वरिष्ठाय नमः, ऊँ गरिष्ठाय नमः, ऊँ वज्राङ्कुशधराय नमः, ऊँ वरदाभयहस्ताय नमः, ऊँ वामनाय नमः, ऊँ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः, ऊँ श्रेष्ठाय नमः, ऊँ मितभाषिणे नमः, ऊँ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः, ऊँ पुष्टिदाय नमः, ऊँ स्तुत्याय नमः, ऊँ स्तोत्रगम्याय नमः, ऊँ भक्तिवश्याय नमः, ऊँ भानवे नमः, ऊँ भानुपुत्राय नमः, ऊँ भव्याय नमः, ऊँ पावनाय नमः, ऊँ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः, ऊँ धनदाय नमः, ऊँ धनुष्मते नमः, ऊँ तनुप्रकाशदेहाय नमः, ऊँ तामसाय नमः, ऊँ अशेषजनवन्द्याय नमः, ऊँ विशेशफलदायिने नमः, ऊँ वशीकृतजनेशाय नमः, ऊँ पशूनां पतये नमः, ऊँ खेचराय नमः, ऊँ खगेशाय नमः, ऊँ घननीलाम्बराय नमः, ऊँ काठिन्यमानसाय नमः, ऊँ आर्यगणस्तुत्याय नमः, ऊँ नीलच्छत्राय नमः, ऊँ नित्याय नमः, ऊँ निर्गुणाय नमः, ऊँ गुणात्मने नमः, ऊँ निरामयाय नमः, ऊँ निन्द्याय नमः, ऊँ वन्दनीयाय नमः, ऊँ धीराय नमः, ऊँ दिव्यदेहाय नमः, ऊँ दीनार्तिहरणाय नमः, ऊँ दैन्यनाशकराय नमः, ऊँ आर्यजनगण्याय नमः, ऊँ क्रूराय नमः, ऊँ क्रूरचेष्टाय नमः, ऊँ कामक्रोधकराय नमः, ऊँ कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः, ऊँ परिपोषितभक्ताय नमः, ऊँ परभीतिहराय नमः और ऊँ भक्तसंघमनोऽभीष्टफलदाय नमः.