scorecardresearch

दक्षिण भारत के मंदिरों के आसपास क्यों नहीं लगती नॉन-वेज पर रोक? जानिए इसके पीछे की परंपरा और वजह

दक्षिण भारत में कई प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों के आसपास नॉन-वेज होटल और मछली बाजार सामान्य रूप से चलते हैं. इसके बावजूद लोगों की धार्मिक आस्था पर कोई असर नहीं पड़ता. इसकी वजह दक्षिण भारत की संस्कृति, इतिहास, स्थानीय परंपराएं और लोगों की जीवनशैली से जुड़ी हुई है.

Advertisement
South Indian temples South Indian temples

उत्तर भारत के कई हिस्सों में मंदिरों के आसपास मांस और मछली की दुकानों को लेकर अक्सर विवाद देखने को मिलता है. वहीं दक्षिण भारत में तस्वीर काफी अलग है. यहां कई प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों के आसपास नॉन-वेज होटल और मछली बाजार सामान्य रूप से चलते हैं. इसके बावजूद लोगों की धार्मिक आस्था पर कोई असर नहीं पड़ता. इसकी वजह दक्षिण भारत की संस्कृति, इतिहास, स्थानीय परंपराएं और लोगों की जीवनशैली से जुड़ी हुई है.

खानपान को धर्म नहीं, व्यक्तिगत पसंद माना जाता है
दक्षिण भारत में भोजन को ज्यादातर व्यक्तिगत पसंद और स्थानीय संस्कृति का हिस्सा माना जाता है. यहां मंदिर के भीतर धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है, लेकिन मंदिर के बाहर लोगों के खानपान पर रोक लगाने की परंपरा नहीं रही है. कई समुदाय जैसे नायर, रेड्डी, वोक्कालिगा, थेवर और केरल के कुछ ब्राह्मण समुदाय भी लंबे समय से मांस और मछली का सेवन करते आए हैं.

दक्षिण भारत के अधिकतर बड़े मंदिर देवस्थानम बोर्ड या मठों के जरिए संचालित होते हैं. इन संस्थाओं में स्थानीय समाज की भागीदारी रहती है. इसलिए मंदिर के बाहर लोगों के खानपान को लेकर सख्त नियम लागू करने की प्रवृत्ति कम देखने को मिलती है. इसके अलावा द्रविड़ आंदोलन और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी धार्मिक मामलों में अपेक्षाकृत उदार सोच को बढ़ावा दिया है.

रोजगार से भी जुड़ा है नॉन-वेज कारोबार
तमिलनाडु के रामेश्वरम और आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम जैसे मंदिर क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मछुआरे और स्थानीय परिवार नॉन-वेज कारोबार से अपनी आजीविका चलाते हैं. ऐसे इलाकों में मांस और मछली की दुकानों को बंद करना व्यावहारिक नहीं माना जाता. समुद्री क्षेत्रों में मछली और सी-फूड स्थानीय खानपान का अहम हिस्सा हैं.

भक्ति पर ज्यादा, खानपान पर कम जोर
दक्षिण भारत की धार्मिक परंपराओं में भक्ति, आस्था और व्यक्तिगत साधना को अधिक महत्व दिया जाता है. कई लोक परंपराओं और कुछ शैव तथा शक्त संप्रदायों में मांस का प्रसाद या भोग चढ़ाने की परंपरा भी रही है. यही कारण है कि मंदिरों के आसपास नॉन-वेज मिलने पर आमतौर पर विरोध नहीं होता.

इन मंदिरों के आसपास मिल जाता है नॉन-वेज
रामेश्वरम, मीनाक्षी मंदिर, चिदंबरम नटराज मंदिर, अरुणाचलेश्वर मंदिर और श्रीशैलम जैसे प्रसिद्ध मंदिरों के आसपास नॉन-वेज होटल और रेस्टोरेंट आसानी से मिल जाते हैं. हालांकि मंदिर परिसर के अंदर धार्मिक नियमों के अनुसार केवल शाकाहारी भोजन ही स्वीकार किया जाता है.

तिरुपति इसका बड़ा अपवाद
आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति बालाजी मंदिर इस मामले में अलग माना जाता है. तिरुमला पहाड़ी पर नॉन-वेज भोजन पूरी तरह प्रतिबंधित है. हालांकि नीचे स्थित तिरुपति शहर में नॉन-वेज भोजन आसानी से उपलब्ध है. यही दिखाता है कि दक्षिण भारत में धार्मिक नियम और आम लोगों की जीवनशैली के बीच संतुलन बनाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है.

ये भी पढ़ें: