भोलेनाथ और रुद्र के दो रूपों में छिपा जीवन का गहरा सत्य
भोलेनाथ और रुद्र के दो रूपों में छिपा जीवन का गहरा सत्य
हिंदू धर्म में भगवान शिव को एक साथ दो बिल्कुल अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है- भोलेनाथ और रुद्र. एक ओर वे सबसे सरल, मासूम और जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं, तो दूसरी ओर वही शिव सबसे उग्र, प्रलयंकारी और भय उत्पन्न करने वाले भी माने जाते हैं. अब सवाल उठता है कि एक ही ईश्वर में ये दोनों विपरीत गुण कैसे हो सकते हैं? तो चलिए आपको इस सवाल का जवाब बताते हैं.
भोलेनाथ: सरल और निष्काम भगवान
‘भोला’ शब्द का अर्थ होता है सरल, निष्कपट और बिना किसी छल-कपट के. भगवान शिव को भोलेनाथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों की छोटी-सी भक्ति से भी तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं. पुराणों में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं, जहां शिव ने बिना ज्यादा सोचे-समझे वरदान दे दिए, चाहे सामने देवता हों या असुर.
भगवान शिव न तो धन के लोभ में बंधे हैं, न ही ऐश्वर्य के. वे कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, भस्म धारण करते हैं और आडंबर से दूर रहते हैं. एक बेलपत्र, थोड़ा जल और सच्ची श्रद्धा बस इतना ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए काफी है. उनकी यह सरलता कमजोरी नहीं, बल्कि पूर्ण पवित्रता का प्रतीक है. शिव कुछ पाने की इच्छा नहीं रखते, इसलिए वे बिना शर्त सब कुछ देने वाले हैं. इसलिए उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है.
रुद्र: उग्र और संहार करने वाले शिव
वहीं भोलेनाथ जब रुद्र रूप में प्रकट होते हैं, तो वे सबसे खतरनाक भी बन जाते हैं. रुद्र वह शक्ति है जिनका क्रोध त्रिपुरासुर जैसे दैत्यों के तीनों लोकों को भस्म कर सकता है. उनकी तीसरी आंख खुलते ही कामदेव तक राख हो गए थे. दरअसल, शिव महाकाल हैं और समय के स्वामी हैं. समय किसी को नहीं बख्शता. जो सत्य से जुड़ा है, उसके लिए शिव मुक्ति हैं, लेकिन जो अहंकार, मोह और झूठ से चिपका हुआ है. उसके लिए शिव भय का कारण बन जाते हैं. उनका संहार अकारण नहीं होता, वे केवल असत्य और अहंकार का नाश करते हैं.
मनुष्य के लिए संदेश
भोलेनाथ हमें सिखाते हैं कि जीवन को सरल और निष्कपट भाव से जिया जाए. वहीं रुद्र यह याद दिलाते हैं कि हमारे भीतर का झूठ, अहंकार और मोह टिकने वाला नहीं है. शिव से प्रेम करने का अर्थ है परिवर्तन को स्वीकार करना. उनसे डरने का अर्थ है सत्य का विरोध करना.