पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित कथा के दौरान धर्म और परमार्थ के वास्तविक अर्थ पर विस्तार से चर्चा की. इस दौरान बताया कि धर्म का मतलब केवल पूजा-पाठ करना, मंदिरों या चर्चों में जाना, तिलक लगाना या माला जपना नहीं है. असली धार्मिकता किसी दीन-दुखी के जीवन में उजाला लाना, भूखे को भोजन कराना और प्यासे को पानी पिलाना है. इसे एक कहानी के जरिए समझाया गया जिसमें मंदिर में घी का दीपक जलाने वाले अमीर सेठ को नरक और अंधेरी गली में राहगीरों के लिए तेल का दीपक जलाने वाले गरीब मजदूर को स्वर्ग मिलता है. इसके साथ ही दिखावटी दान करने वालों पर भी तंज कसा गया. ग्यारह सौ रुपये के पंखे पर तीन पीढ़ियों के नाम लिखवाने और 'गुप्त दान' के नाम पर मंच से बार-बार अपना नाम बुलवाने की चाहत रखने वाले लोगों के मजेदार किस्से सुनाकर दान के पीछे की मानसिकता को उजागर किया गया. देखिए अच्छी बात.