इस धार्मिक कथा में नारद मुनि और भगवान विष्णु के बीच के प्रसिद्ध 'नारद मोह' प्रसंग का वर्णन किया गया है. कथावाचक बताते हैं कि कैसे नारद जी राजा शीलनिधि की पुत्री विश्वमोहिनी के स्वयंवर में जाने के लिए भगवान विष्णु से उनका सुंदर रूप मांगते हैं. भगवान ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए उन्हें 'हरि' का रूप दिया, जिसका एक अर्थ वानर भी होता है. स्वयंवर में जब राजकुमारी ने नारद जी के वानर मुख को देखकर उन्हें अस्वीकार कर दिया, तो नारद जी ने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया. कथा के अंत में भगवान अपनी माया हटाते हैं और नारद जी को अपनी गलती का अहसास होता है. वक्ता कहते हैं, 'जिसका विवाह होगा, समरबूम से ही जीतना कोई उसको कोई व्यक्ति युद्ध में नहीं जीत पायेगा'