प्रयागराज में आयोजित सत्संग के दौरान भोजन को प्रसाद बनाने और भगवान की भक्ति का महत्व समझाया गया। प्रवचन में बताया गया कि माताओं को भोजन बनाते समय फिल्मी गाने सुनने के बजाय भगवान का ध्यान करना चाहिए, जिससे भोजन प्रसाद बन सके। प्रसाद का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया गया कि 'प्र' का अर्थ प्रत्यक्ष, 'सा' का अर्थ साक्षात् और 'द' का अर्थ दर्शन है। इसके साथ ही पुरानी परंपराओं को याद करते हुए पहली रोटी गाय को और अंतिम रोटी कुत्ते को देने की बात कही गई। वर्तमान समय में इस परंपरा के लुप्त होने पर चिंता व्यक्त की गई। इसके अलावा, माता जानकी और हनुमान जी के प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि व्यक्ति को बाहर से संसारी और अंदर से सन्यासी होना चाहिए। अंत में 'सुंदर है नाम राम का' भजन के माध्यम से संतों के संग बैठकर भगवान का नाम जपने और सत्संग के महत्व पर जोर दिया गया।