प्रवचन के दौरान कथा सुनने के महत्व और नियमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया. वक्ता ने कहा कि पंडाल में बैठना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कथा का हृदय में उतरना आवश्यक है. इसके लिए कथा के सात प्रमुख नियम बताए गए, जिनमें कथा पूरी होने तक न उठना, सात दिनों तक असत्य न बोलना, भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, अल्प सात्विक आहार ग्रहण करना, मस्तक पर तिलक लगाकर गुरु मंत्र का जप करना और किसी के प्रति ईर्ष्या भाव न रखना शामिल है. इसके साथ ही भगवान के लिए प्रहलाद, विभीषण, भरत और राजा बलि द्वारा किए गए त्याग का उदाहरण देकर भागवत के भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मर्म को समझाया गया. अमृत और कथामृत की तुलना करते हुए स्पष्ट किया गया कि सांसारिक अमृत केवल मृत्यु टाल सकता है, परंतु कथामृत व्यक्ति को समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है.