कथा में बताया गया है कि निष्किंचन भक्त श्री विप्र हरिपाल जी साधुओं की सेवा में अपनी पूरी संपत्ति लुटा देते थे। संपत्ति समाप्त होने पर और उधारी मिलना बंद होने पर उन्होंने संतों के भंडारे के लिए केवल भोजन सामग्री चुराना शुरू कर दिया। वे केवल उन्हीं लोभी लोगों के घर चोरी करते थे जो भगवत भक्त नहीं थे। शादी के बाद जब हजारों संतों के आगमन पर घर में अन्न का एक दाना नहीं बचा, तो वे संतों को भोजन कराने के लिए जंगल के रास्ते में लाठी लेकर लूटपाट करने खड़े हो गए। अपने भक्त की लाज बचाने के लिए स्वयं भगवान द्वारकाधीश और माता रुक्मिणी सेठ-सेठानी का रूप धारण कर वहां प्रकट हुए।