इस कथा में सच्ची भक्ति के अर्थ को भगवान कृष्ण के पेट दर्द और गोपियों द्वारा नरक जाने के डर के बावजूद अपने चरणों की रज देने के प्रसंग से समझाया गया है। यह बताया गया है कि भक्ति भगवान की प्रसन्नता के लिए होती है, यह कोई व्यापार नहीं है। इसके साथ ही नागपुर में हो रहे विरोध और पुतला दहन पर भी प्रतिक्रिया दी गई है। यह स्पष्ट किया गया है कि जिसकी निंदा होती है, वही समाज में जीवित है। नागपुर के रेशम बाग से ही पूरे देश में पहचान मिलने की बात कही गई है और विरोधियों को लंबी आयु का आशीर्वाद दिया गया है क्योंकि आलोचना इंसान को सजग बनाती है। अंत में रामसेतु निर्माण के दौरान एक छोटी गिलहरी के योगदान और भगवान राम द्वारा उसकी पीठ पर उंगलियों के निशान छोड़ने की कथा सुनाई गई है, जो यह संदेश देती है कि भगवान के कार्य में हर छोटे योगदान का महत्व होता है।