इस प्रवचन में कर्म, भाग्य और मनुष्य के सुख-दुख के कारणों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि हर मनुष्य अपने सुख और दुख का कारण स्वयं होता है और अपने कर्मों का फल ही भोगता है। पूर्व कर्मों से मिलने वाले कष्टों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन भक्ति और मार्गदर्शन से उनकी तीव्रता को कम किया जा सकता है। संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में दुखों का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन सच्चा सुख और शांति बाहर की दुनिया में खोजने के बजाय इंसान को अपने भीतर खोजनी चाहिए। उदाहरण के जरिए यह समझाया गया है कि बाहरी भौतिक चीजों में संतुष्टि ढूंढने से केवल तृष्णा बढ़ती है, जबकि जीवन में जो प्राप्त है उसी में संतोष करने से वास्तविक सुख मिलता है। इसके साथ ही जीवन का मालिकाना हक ईश्वर को सौंपने और उनके प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखने का संदेश दिया गया है।