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वैज्ञानिकों ने खोजा बुरी यादों को मिटाने का तरीका लेकिन क्या ऐसा करना सही होगा?

यादें हमारे दिमाग में मेमोरी ट्रेस के रूप में स्टोर होती हैं. यानी जब हम कोई घटना याद करते हैं तो दिमाग की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय होती हैं.

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कई बार जिंदगी में कुछ यादें इतनी दर्दनाक होती हैं कि इंसान उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है. किसी अपने की मौत, हादसा या बुरा अनुभव सालों तक दिमाग में घूमता रहता है. अब वैज्ञानिक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जिससे इंसान की दर्दनाक यादों को भुलाया जा सके.

अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर स्टीव रामिरेज इसी विषय पर रिसर्च कर रहे हैं. उनके मुताबिक भविष्य में PTSD यानी ट्रॉमा से जुड़ी मानसिक समस्याओं के इलाज में यह तकनीक मददगार हो सकती है.

दोस्त की मौत ने बदल दी जिंदगी
स्टीव रामिरेज के करीबी दोस्त और लैब पार्टनर जू लियू की 2015 में अचानक मौत हो गई थी. इस घटना के बाद वे लगातार दुख और तनाव में रहने लगे. दर्दनाक यादों से बचने के लिए उन्होंने शराब का सहारा लिया और धीरे-धीरे उन्हें गंभीर शराब की लत लग गई.

रामिरेज बताते हैं कि एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि हालत नियंत्रण से बाहर जा रही है. इसके बाद दोस्तों और परिवार की मदद से उन्होंने इलाज शुरू किया और शराब छोड़ दी. यही अनुभव बाद में उनकी रिसर्च की प्रेरणा बना.

दिमाग में कैसे बनती हैं यादें?
वैज्ञानिकों के मुताबिक यादें हमारे दिमाग में मेमोरी ट्रेस के रूप में स्टोर होती हैं. यानी जब हम कोई घटना याद करते हैं तो दिमाग की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय होती हैं. हर बार किसी याद को दोहराने पर वह और मजबूत या कमजोर हो सकती है. इसी प्रक्रिया को रीकंसोलिडेशन कहा जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी दौरान यादों को बदला जा सकता है.

चूहों पर हुए प्रयोग में क्या मिला?
2009 में कनाडा के वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक प्रयोग किया. उन्होंने चूहों को एक आवाज के साथ हल्का इलेक्ट्रिक झटका दिया. कुछ समय बाद सिर्फ आवाज सुनकर ही चूहे डरने लगे. इसके बाद वैज्ञानिकों ने दिमाग की उन कोशिकाओं को खत्म कर दिया जो इस डर से जुड़ी याद को स्टोर कर रही थीं. हैरानी की बात यह रही कि बाद में चूहे आवाज सुनकर डरना बंद कर चुके थे.

नकली याद भी डाली गई
2012 में रामिरेज और उनकी टीम ने एक और प्रयोग किया. उन्होंने रोशनी की मदद से चूहों के दिमाग की खास कोशिकाओं को सक्रिय किया. इससे बिना किसी असली खतरे के भी चूहों में डर की प्रतिक्रिया दिखी. इसके बाद वैज्ञानिकों ने चूहों में फॉल्स मेमोरी डालने का दावा भी किया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी पाया कि किसी बुरी याद के साथ अच्छी याद को जोड़कर डर को कम किया जा सकता है.

इंसानों में कैसे हो सकता है इस्तेमाल?
फिलहाल यह तकनीक इंसानों पर इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि सीधे दिमाग की कोशिकाओं से छेड़छाड़ करना जोखिम भरा हो सकता है. हालांकि कुछ गैर-आक्रामक तरीके पहले से इस्तेमाल हो रहे हैं. जैसे CBT यानी Cognitive Behavioural Therapy, जिसमें मरीज को नकारात्मक यादों को नए नजरिए से देखने की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके अलावा EMDR थेरेपी में मरीज को दर्दनाक यादें याद करते समय आंखों की मूवमेंट या दूसरी गतिविधियों पर ध्यान देने को कहा जाता है, ताकि डर का असर कम हो सके.

क्या पूरी तरह मिट सकती हैं यादें?
वैज्ञानिक मानते हैं कि फिलहाल इंसानों की यादों को पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है. लेकिन उन्हें कमजोर करना या उनसे जुड़ा डर कम करना जरूर संभव हो सकता है.

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