सूर्य की सतह इलेक्ट्रिकली चार्ज गैसों से भरी हुई है जो लगातार पॉवरफुल मैग्नेटिक फोर्स उत्पन्न करती रहती है.
सूर्य की सतह इलेक्ट्रिकली चार्ज गैसों से भरी हुई है जो लगातार पॉवरफुल मैग्नेटिक फोर्स उत्पन्न करती रहती है.
सूर्य की सतह(Sun surface) इलेक्ट्रिकली चार्ज गैसों से भरी हुई है जो लगातार पॉवरफुल मैग्नेटिक फोर्स उत्पन्न करती रहती है. जितनी दूर तक ये गैस मैग्नेटिक फोर्स पैदा करता है उसे मैग्नेटिक फील्ड कहते हैं. चूंकि ये गैस गतिशील होती हैं इसलिए ये मैग्नेटिक फील्ड को खींचती हैं और घुमाती रहती हैं. आसान शब्दों में कहें तो गैस कुछ देर के लिए किसी एक खास क्षेत्र की तरफ जा रहा है तो उस क्षेत्र में मैग्नेटिक फील्ड बना देगा.
कई बार गैसों की वजह से बन रहे मैग्नेटिक फील्ड के उलझाव या खींचतान की वजह से विस्फोट हो जाता है जिसे सोलर फ्लेयर(solar flares) कहते हैं. ये सोलर फ्लेयर इतना प्रभावशाली होता है कि इससे रेडियो ब्लैकआउट हो सकता है और यह पृथ्वी पर भी प्रभाव डाल सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार इसकी मॉनिटरिंग करते रहते हैं. अब नासा ने अपने सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी का उपयोग करते हुए सूर्य के सोलर फ्लेयर छोड़ते हुए तस्वीरें कैद की है और इस आश्चर्यजनक घटना की तस्वीर अपने इंस्टाग्राम पेज पर शेयर किया है.
20 जनवरी को छोड़ा था सोलर फ्लेयर
नासा ने इसे M5.5 कैटेगरी फ्लेयर के रूप में क्लासीफाई किया है. एजेंसी ने कहा कि सूर्य ने 20 जनवरी को सोलर फ्लेयर छोड़ा था और यह लगभग 1:01 बजे के आसपास अपने पीक पोजीशन पर था. सोलर फ्लेयर्स में रेडियो कम्यूनिकेशन, इलेक्ट्रिक पावर ग्रिड, नेविगेशन सिग्नल को प्रभावित करने और अंतरिक्ष यान और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जोखिम पैदा करने की क्षमता है. सोलर फ्लेयर आमतौर पर सक्रिय क्षेत्रों में होते हैं, जो मैग्नेटिक फील्ड की मजबूत उपस्थिति से चिह्नित होते हैं. जैसे-जैसे ये मैग्नेटिक फील्ड विकसित होते हैं, वे अस्थिरता के बिंदु तक पहुंच सकते हैं और कई रूपों में ऊर्जा छोड़ सकते हैं, जिसे सोलर फ्लेयर्स के रूप में देखा जाता है. सोलर फ्लेयर्स सक्रिय क्षेत्रों में होती हैं.
पिछले महीने नासा ने पृथ्वी से टकराने वाले सूर्य के मलबे के घूमने की चेतावनी दी थी. रेडियो और जीपीएस सेवाओं में भी हल्की गड़बड़ी की संभावना थी. लेकिन, उस वक्त ऐसा कुछ नहीं हुआ. सोलर स्टॉर्म कोई नहीं घटना नहीं है और यह समय समय पर होते रहते हैं.
इससे पहले पिछले साल नासा की तरफ से भेजे गए एक स्पेसक्राफ्ट ने सूर्य के कोरोना को टच किया था. वहां का तापमान करीब दो लाख डिग्री फारेनहाइट था. तब नासा की तरफ से यह जानकारी दी गई थी कि ऐसा कभी नहीं हुआ है. इससे सूर्य और वहां के आसपास के वातावरण को समझने में मदद मिलेगी. स्पेसक्राफ्ट ने वहां के कणों का नमूना लिया था जिससे यह प्रमाणित हुआ था.