दुनियाभर में कोविड-19 से लड़ने के लिए अलग-अलग परीक्षण चल रहे हैं. ऐसे में एस्ट्राजेनेका (AstraZeneca) कंपनी ने दावा किया है कि उनका नया एंटीबॉडी ट्रीटमेंट लोगों को गंभीर कोविड होने से बचा सकता है. एस्ट्राजेनेका ने अभी-अभी फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trials) के नतीजे जारी किए हैं. इस नए ट्रीटमेंट का नाम है 'AZD7442', जो कोविड रोगियों में गंभीर बीमारी होने या मृत्यु से बचा सकता है.
कंपनी द्वारा यह उम्मीद जताई गयी है कि AZD7442 की एक खुराक कोविड के क्रिटिकल केस में 12 से 18 महीने तक की सुरक्षा प्रदान कर सकती है. हालांकि असल में यह कितनी और कबतक सुरक्षा देता है इसके लिए इंतजार करना होगा.
क्या है यह ट्रीटमेंट?
AZD7442 दो मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal Antibodies) टिक्साजेवीमाब (tixagevimab) और सिलगाविमाब (cilgavimab) का एक कॉकटेल है. कॉकटेल यानी मिश्रण. ये मिश्रण SARS-CoV-2 संक्रमण की गंभीरता को कम करने के लिए डिजाइन किया गया है. यह लोगों को गंभीर रूप से बीमार होने से बचाता है. लेकिन इस और अन्य एंटीबॉडी-बेस्ड ट्रीटमेंट के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि AZD7442 में, एंटीबॉडी को इस तरह से मॉडिफाई किया गया है की वे लंबे समय तक शरीर में रह सकें.
कैसे काम करता है मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ट्रीटमेंट?
अब अगर इसकी पूरी प्रक्रिया को आसान शब्दों में समझें, तो एस्ट्राजेनेका के अनुसार, जैसे ही ये दवा मानव शरीर के भीतर जाती है ये वायरस को ब्लॉक कर देती है. इस वजह से कोरोना वायरस दूसरे सेल्स के अंदर प्रवेश नहीं कर पाता है. ऐसा इसलिए हो पाता है क्योंकि उस वायरस को शरीर के अंदर बढ़ने के लिए जो महत्वपूर्ण तत्व चाहिए होते हैं वह नहीं मिल पाते. ये दोनों एंटीबॉडी मिलकर उस वायरस को शरीर के अंदर मल्टीप्लाई होने से रोकती हैं और वायरस को न्यूट्रलाइज कर देती हैं.
फेज-3 ट्रायल में हुए 900 लोग शामिल
एस्ट्राजेनेका के फेज-3 ट्रायल की बात करें, तो इस अध्ययन में 903 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जिनमें से 822 लोगों पर प्राइमरी एनालिसिस किया गया. ये वो लोग थे जिनकी उम्र 18 वर्ष से अधिक थी. इनमे से लगभग 13% लोग 65 वर्ष और उससे अधिक के थे. इन सभी में 90% लोग ऐसे थे जिन्हें कैंसर, शुगर, मोटापा, फेफड़ों की परेशानी या कमजोर इम्यूनिटी जैसी गंभीर समस्या थी, जो उन्हें हाई रिस्क में डालती है.
क्या रहे ट्रायल के रिजल्ट?
फेज-3 ट्रायल के परीक्षण में, रोगियों को इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन (intramuscular injection) के माध्यम से 600mg AZD7442, 452 लोगों को लगाया गया. इसके साथ 451 लोगों को प्लेसबो (Placebo) दिया गया. रिजल्ट बताते हैं कि AZD7442 समूह के लोगों में प्लेसबो लेने वालों की तुलना में गंभीर कोविड विकसित होने की संभावना 50% कम थी.
पहले भी इस ट्रीटमेंट का होता आया है इस्तेमाल
आपको बता दें, बीमारी से लड़ने के लिए आर्टिफिशियल रूप से एंटीबॉडी विकसित करना कोई नई तकनीक नहीं है. इस तकनीक का उपयोग पहले से ही ल्यूकेमिया, स्तन कैंसर और ल्यूपस सहित कई बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है. यह पहली बार भी नहीं है जब इस तकनीक का इस्तेमाल कोविड के लिए किया गया है. अगस्त 2021 में यूके (UK) में पहले कोविड मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ट्रीटमेंट को मंजूरी दी गई थी.