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अगर कोई दुर्घटनाग्रस्त हो और बहुत ज्यादा खून बह रहा हो तो पहले कुछ मिनट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ऐसे में जरुरी हो जाता है कि उन्हें जल्द से जल्द ब्लीडिंग को रोकने के लिए सही दवाएं दी जाएं. पर समस्या इन नैनोमेडिसिन को सही दर से देने की है. क्योंकि अगर इनके इन्फ्यूजन की गति बढ़ायी जाए तो निगेटिव रिएक्शन हो सकते हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड बाल्टीमोर काउंटी (यूएमबीसी) के शोधकर्ताओं ने इन जीवन रक्षक दवाओं के नैनोपार्टिकल की सतहों को संशोधित करने का एक अनूठा तरीका विकसित किया है. ताकि अधिक तेज़ी से इन्फ्यूजन हो और कोई निगेटिव रिएक्शन भी न हो.
इन्फ्यूजन रिएक्शन से कई तरह के लक्षण हो सकते हैं जैसे रैशेस या जलन. इन रिएक्शन में एनाफिलेक्सिस भी शामिल है, जिसमें श्वसन तंत्र फेल हो जाता है. इन रिएक्शंस के कारण नैनोमेडिसिन का उपयोग बहुत सीमित हो गया है. लेकिन अगर इन निगेटिव रिएक्शन को कम से कम कर दिया जाए तो चीजें बहुत बदल सकती हैं.
चार शोधकर्ताओं ने किया शोध:
हाल ही में रसायन, जैव रासायनिक और पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर एरिन लविक, जैविक विज्ञान के प्रोफेसर, चक बीबरिच, केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी नुज़हत मैशा, और जैविक विज्ञान में पीएचडी माइकल रूबेनस्टीन ने ‘नैनो लेटर्स’ नाम से एक पेपर पब्लिश किया है.
इसमें उन्होंने मरीजों को दिए जाने वाले नैनोपार्टिकल के कोर मटेरियल पर ध्यान केंद्रित किया है. उन्होंने पाया कि पॉलीयूरेथेन कोर का उपयोग करने से इन्फ्यूजन रिएक्शन से जुड़े मार्कर कम हो गए हैं. वर्तमान में 7% लोगों को इन्फ्यूजन रिएक्शन होते हैं. इन रिएक्शन से कारण बहुत को उपचार उपलब्ध होने के बावजूद नहीं दिया जा सकता है.
इसलिए शोधकर्ताओं ने इन रिएक्शन को कम से कम करने के लिए नैनोपार्टिकल के सरफेस में संशोधन करने की कोशिश की है. उनका कहना है कि यह प्रक्रिया प्रभावी है. लेकिन अगर भविष्य में कोर मटेरियल को ही बदल दिया जाए तो और ज्यादा प्रभावी रहेगा.
यह शोध आंतरिक रक्तस्राव (इंटरनल ब्लीडींग) को रोकने के लिए नैनोकैप्सूल का उपयोग करके प्रीक्लिनिकल मॉडल के भविष्य के परीक्षण के लिए आधार तैयार करता है.