scorecardresearch

भीषण गर्मी के बीच जून में तेजी से पिघल रहे स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर, क्या हैं इसके मायने?

जून के महीने में स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियर्स तेजी से पिघल रहे हैं. स्विट्जरलैंड जो की अपनी ग्लेशियरों की ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है, वहां पर बर्फ पच्चीस फीसदी कम हो चुकी है और सर्दियों में जमा हुई बर्फ आगे 24 घंटों में पूरी तरह खत्म हो जाने की आशंका है. यदि आने वाले महीनों में गर्म मौसम बना रहता है, तो बड़े पैमाने पर बर्फ और हिम के पिघलने की आशंका है.

Glacier Glacier

यूरोप में जारी भीषण गर्मी का असर अब स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियरों पर भी गंभीर रूप से दिखाई दे रहा है. स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियर मॉनिटरिंग नेटवर्क (GLAMOS) के अनुसार, पिछले सर्दियों में जमा हुई बर्फ और हिम सोमवार तक पूरी तरह पिघल जाने की आशंका है. सामान्यतः यह स्थिति अगस्त के मध्य में आती थी, लेकिन इस वर्ष जून के अंत में ही यह स्तर पहुंच जाना जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बाद होने वाली हर अतिरिक्त बर्फबारी से पहले तक की पिघलन सीधे ग्लेशियरों के आकार को कम करेगी. इस वर्ष सर्दियों में सामान्य से कम हिमपात हुआ, जबकि सहारा रेगिस्तान से आई धूल ने ग्लेशियरों की सतह को गहरा बना दिया. इससे सूर्य की गर्मी अधिक अवशोषित हुई और बर्फ तेजी से पिघलने लगी. 

यूरोप में रिकॉर्डतोड़ हीटवेव-
यूरोप इस समय रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव का सामना कर रहा है. कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है, जिससे स्वास्थ्य, कृषि, परिवहन और ऊर्जा व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ऐसी चरम मौसमी घटनाओं को अधिक बार और अधिक तीव्र बना रहा है. स्विस ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना इस वैश्विक संकट का एक स्पष्ट संकेत है. जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक आपातकाल है, जो किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है. इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया के नेताओं ने मिलकर पेरिस समझौता (Paris Agreement) अपनाया था, जो कि एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसके तहत देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप स्वयं को ढालने (अनुकूलन) के लिए कदम उठाने होते हैं. वैश्विक संगठन दुनिया के तमाम देशों को इसी पल निष्क्रमण के तहत तापमान को कम करने के लिए कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. लेकिन अभी तक इस दिशा में ठोस क़दम नहीं उठाए गए हैं. यूरोप के कई देशों में तापमान 40° के पार है. जिसका असर आम जान जीवन पर दिखाई दे रहा है. 

सर्दियों में जमी बर्फ 24 घंटे में पिघल जाएगी-
स्विट्जरलैंड जो की अपनी ग्लेशियरों की ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है, वहां पर बर्फ पच्चीस फीसदी कम हो चुकी है और सर्दियों में जमा हुई बर्फ आगे चौबीस घंटों में पूरी तरह ख़त्म हो जाने की आशंका है. स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियर वर्ष 2026 की गर्मियों में सामान्य से काफी कम बर्फ की सुरक्षात्मक परत के साथ प्रवेश कर रहे हैं. यदि आने वाले महीनों में गर्म मौसम बना रहता है, तो बड़े पैमाने पर बर्फ और हिम के पिघलने की आशंका है. यह जानकारी ग्लेशियर मॉनिटरिंग स्विट्ज़रलैंड (GLAMOS) की नई रिपोर्ट में दी गई है. 

2010-20 की तुलना में 25 फीसदी कम बर्फ जमी थी-
रिपोर्ट के अनुसार, स्विस ग्लेशियरों पर इस सर्दी जमा हुई बर्फ वर्ष 2010–2020 के औसत की तुलना में 25 प्रतिशत कम रही. इससे वर्ष 2026 पिछले दो दशकों के सबसे कम बर्फबारी वाले वर्षों में शामिल हो गया है. अप्रैल और मई के दौरान 25 ग्लेशियरों पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि स्विस आल्प्स के अधिकांश हिस्सों में बर्फ की गहराई सामान्य से काफी कम थी. दक्षिण-पूर्वी स्विट्ज़रलैंड, विशेषकर एंगाडिन (Engadin) क्षेत्र में, बर्फ का स्तर रिकॉर्ड या रिकॉर्ड के करीब सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. केवल पश्चिमी बर्नीज़ ओबरलैंड और पश्चिमी वैले के कुछ ग्लेशियरों पर बर्फ का स्तर सामान्य के करीब रहा. GLAMOS के वैज्ञानिकों ने कहा कि इस वर्ष ग्लेशियरों पर बर्फ की गहराई औसत से काफी कम दर्ज की गई है. वर्ष 2010–2020 की तुलना में सर्दियों की बर्फ में 25 प्रतिशत की कमी आई है. 

सर्दियों की बर्फ ग्लेशियरों के लिए एक सुरक्षात्मक कंबल का काम करती है, जो नीचे मौजूद बर्फ को गर्मियों की तेज़ गर्मी से बचाती है. जब बर्फ कम होती है, तो यह सुरक्षा जल्दी समाप्त हो जाती है और ग्लेशियरों का पिघलना तेज़ हो जाता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वर्ष की स्थिति हाल के दशकों की सबसे शुष्क सर्दियों जैसी है. हालांकि फरवरी और मार्च में हुई बर्फबारी से कुछ क्षेत्रों में हालात सुधरे थे, लेकिन अप्रैल में असामान्य रूप से गर्म और शुष्क मौसम ने बर्फ का जमाव रोक दिया और समय से पहले पिघलने की प्रक्रिया शुरू कर दी. 

शोधकर्ताओं ने पाया कि कई ग्लेशियरों पर सामान्य से 15 से 40 प्रतिशत कम बर्फ जमा हुई. सबसे गंभीर कमी पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी स्विट्ज़रलैंड में देखी गई. एंगाडिन के पर्स (Pers) और मुर्टेल (Murtèl) ग्लेशियरों में सर्दियों की बर्फ का स्तर रिकॉर्ड न्यूनतम रहा, जबकि ग्रोसर एलेट्श, रोन और सिल्व्रेटा ग्लेशियर भी वर्ष 2000 से अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गए. 

इसका असर आने वाली गर्मियों में साफ दिखाई दे सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2026 में गर्मियों के दौरान सुरक्षात्मक बर्फ की परत जल्दी समाप्त होने से ग्लेशियरों के कुल द्रव्यमान (मास बैलेंस) पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है. 

वैज्ञानिकों ने जताई चिंता-
रिपोर्ट यह भी याद दिलाती है कि 2022 और 2023 में भी कम बर्फबारी के बाद भीषण हीटवेव आई थी, जिसके कारण ग्लेशियरों का रिकॉर्ड स्तर पर क्षरण हुआ था. GLAMOS के वैज्ञानिकों ने पूरे स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियरों पर सैकड़ों स्थानों पर बर्फ की गहराई और घनत्व का मापन किया. इन आंकड़ों के आधार पर ग्लेशियरों के शीतकालीन द्रव्यमान का आकलन किया जाता है, जो यह बताने वाला महत्वपूर्ण संकेतक है कि गर्मियों में ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल सकते हैं. रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि बढ़ते तापमान और घटती बर्फबारी के कारण आल्प्स के ग्लेशियर लगातार अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं. वर्ष 2026 ग्लेशियरों के लिए कितना नुकसानदायक साबित होगा, यह काफी हद तक गर्मियों के मौसम, विशेषकर हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता पर निर्भर करेगा. 
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि औसत से कम बर्फबारी के साथ लंबे समय तक गर्म मौसम बना रहा, तो स्विट्ज़रलैंड के ग्लेशियर तेज़ी से पिघलेंगे. यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के आल्प्स पर्वतमाला पर पड़ रहे दीर्घकालिक और गंभीर प्रभावों को और स्पष्ट करती है.

(आशुतोष मिश्रा की रिपोर्ट)

ये भी पढ़ें: