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IIT Kanpur and Artificial Rain: बुंदेलखंड में खेती करने के लिए नहीं होगी पानी की दिक्कत, IIT कानपुर ने क्लाउड-सीडिंग से बनाई आर्टिफिशियल बारिश

IIT Kanpur and Artificial Rain: अभी तक महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में आर्टिफिशियल बारिश कराई गई है. IIT कानपुर ने भी इसको लेकर सफलतापूर्वक टेस्टिंग कर ली है.

Artificial Rain Artificial Rain
हाइलाइट्स
  • 6 साल लगे इस एक्सपेरिमेंट को करने में 

  • बुंदेलखंड का सूखा होगा खत्म 

उत्तर प्रदेश के सूखे बुंदेलखंड को हरा भरा करने के लिए आर्टिफिशियल बारिश पर काम चल रहा है. इसके लिए IIT कानपुर ने क्लाउड-सीडिंग से आर्टिफिशियल बारिश बनाई है. इसको लेकर सफलतापूर्वक टेस्टिंग की गई है. बुधवार को घने बादलों के बीच पाउडर स्प्रे करते हुए एक एयरस्ट्रिप को 5,000 फीट की ऊंचाई तक उड़ाया गया, जिसके परिणामस्वरूप भारी बारिश हुई.

बुंदेलखंड का सूखा होगा खत्म 

यूपी सरकार ने आर्टिफिशियल बारिश से बुंदेलखंड का सूखा खत्म करने की ठानी है. इस तकनीक के लिए राज्य ने आईआईटी कानपुर की ओर रुख किया था. क्लाउड सीडिंग कई केमिकल एजेंट जिनमें सिल्वर आयोडाइड, सूखी बर्फ और यहां तक ​​की टेबल नमक शामिल हैं, को बादलों में मिलाकर उन्हें गाढ़ा करने और बारिश की संभावना बढ़ाने की प्रक्रिया है. यह एक्सपेरिमेंट सिविल एविएशन रेगुलेटर DGCA की मंजूरी के बाद आयोजित किया गया था.

6 साल लगे इस एक्सपेरिमेंट को करने में 

आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल ने इस आर्टिफिशियल बारिश प्रोजेक्ट को लीड किया था. उन्होंने कहा, "इस दिशा में हमारी क्षमताओं का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है. ऐसा करने में आईआईटी-कानपुर को छह साल लग गए. उत्तर प्रदेश सरकार 2017 में आर्टिफिशियल बारिश के साथ बुंदेलखंड की मदद करने के लिए पहुंची थी. उस समय, चीन महोबा में 10.30 लाख रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से क्लाउड-सीडिंग करने के लिए सहमत हुआ था. लेकिन उस दौरान चीन ने जानकारी शेयर करने से इनकार कर दिया था और ये प्रोजेक्ट बन कर दिया था. 

क्यों लगा इतना समय

दरअसल, आईआईटी कानपुर के पास उपकरण उड़ाने के लिए आवश्यक प्लेन नहीं था. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने बताया कि जैसे ही संस्थान ने यूपी सरकार के अनुरोध पर आर्टिफिशियल बारिश कराने की तैयारी शुरू की, आईआईटी-के के सामने सबसे बड़ी बाधा एयरप्लेन था. ऐसी में पहली पसंद इसरो का हवाई जहाज था, जो पुराना था और ज्यादा उपयोग में नहीं था. लेकिन तब इसरो ने इससे अलग होने के लिए सहमति नहीं जताई थी. 

इसके बाद, खोज हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के एक प्लेन तक सीमित हो गई. इसके लिए एचएएल ने ₹50 लाख मांगे. उस समय उपलब्ध धनराशि उपकरण के लिए थी, लेकिन स्थिति ने बातचीत को खत्म कर दिया. तब इस उद्देश्य के लिए आईआईटी के अपने Cessna एयरक्राफ्ट का उपयोग करने का निर्णय लिया गया. संस्थान ने अमेरिका स्थित Cessna से संपर्क किया.

क्लाउड सीडिंग की लागत

बताते चलें उपकरण लगे प्लेन का किराया ज्यादा होता है और विमान में उपकरण लगाना भी महंगा सौदा है. एचटी की रिपोर्ट के मुतबिक एक घंटे के अभ्यास में लगभग ₹2 से ₹5 लाख खर्च होते हैं. अभी तक महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में आर्टिफिशियल बारिश कराई गई है. आर्टिफिशियल बारिश का पर्यावरण पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है. विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले समाधान हानिकारक नहीं होते हैं.