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Psychology Fact: क्या आपके भी भाई-बहन किचन में छोड़ते खाली बोतल? ऑफिस में कलीग भी नहीं सोचता उसे भरने की... तो गलती उनकी नहीं, सारा दिमाग का खेल है गुरु

अक्सर होता है कि जिसके साथ हम अपनी पानी की बोतल शेयर करते हैं, तो कई बार एक-दूसरे से कहते हैं कि भर के ले आते. लेकिन उसके पहले से न भरने के पीछे कोई ठोस इरादे वाली वजह नहीं बल्कि यह पूरा एक दिमागी खेल होता है.

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क्या आपके घर या ऑफिस में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो पानी की बोतल खाली करके वापस रख देता है, लेकिन उसे भरने की जहमत नहीं उठाता? हम अक्सर सोचते हैं कि यह आदत उस व्यक्ति की लापरवाही को दिखाती है. लेकिन साइकोलॉजी इस आम आदत को थोड़ा अलग नजरिए से समझाती है.

क्या सच में है ये गलती?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब कोई व्यक्ति बार-बार शेयर की जाने वाली जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करता दिखता है, तो इसके पीछे हमेशा जानबूझकर की गई लापरवाही नहीं होती. बल्कि यह हमारे दिमाग के काम करने के तरीके से जुड़ा हुआ है. रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम, जैसे बोतल भरना, हमारे दिमाग में उतनी जगह नहीं बनाते जितनी बड़ी जिम्मेदारियां बनाती हैं. इसलिए यह काम अक्सर भूल जाता है, इरादतन छोड़ा नहीं जाता.

आदतें और दिमागी थकान

दिनभर में हमारा दिमाग हजारों छोटे-छोटे फैसले लेता है. इसे साइकोलॉजी में डिसीजन फटीग यानी फैसला लेने की थकान कहा जाता है. जब दिमाग पहले से ही कई कामों में उलझा होता है, तो बोतल भरने जैसा छोटा काम लिस्ट में सबसे नीचे चले जाते है. यह किसी की सोच-समझकर की गई हरकत नहीं, बल्कि एक तरह की दिमागी चूक होती है.

आदत और इरादा

एक और अहम बात यह है कि हमारा दिमाग उन्हीं कामों को याद रखता है, जो किसी तय आदत का हिस्सा बन चुके हों. अगर बोतल भरना किसी व्यक्ति की रोज की रूटीन में शामिल नहीं है, तो उसका दिमाग इसे अपने आप याद नहीं दिलाता. यही वजह है कि यह व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है, भले ही व्यक्ति की नीयत में कोई खोट न हो.

रिश्तों पर इसका असर

इसके बावजूद, घर या ऑफिस में साथ रहने वालों के लिए यह आदत परेशान करने वाली हो सकती है. बार-बार यही काम करना पड़े तो झुंझलाहट होना आम है. ऐसे में जरूरी है कि इसे सीधे असम्मान न मानें, बल्कि खुलकर बातचीत करें और याद दिलाने का कोई आसान तरीका अपनाएं, जैसे रिमाइंडर या तय बारी.