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कई लोगों में ऐसी आदत होती है कि वह छोटी-छोटी बातों पर भी तुरंत 'सॉर' बोल देते हैं, चाहे उनकी कोई गलती हो या नहीं. पहली नजर में किसी का छोटी सी बात पर सॉरी बोलना एक अच्छी परवरिश की ओर इशारा करता है.
साइकोलॉजी इसे एक अलग एंगल से देखती है. साइकोलॉजी के एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बार-बार सॉरी बोलना वो भी छोटी-छोटी बातों पर, एक तरह से बचपन के एक्सपीरियंस और इमोश्नल माहौल से जुड़ा होता है.
साइकोलॉजी मानती है कि गलती के लिए माफी मांगना और बार-बार सॉरी बोलनी की हैबिट बना लेने में काफी फर्क होता है. जब कोई इंसान अपनी गलती मानता है और सॉरी कहता है, तो वह एक हेल्दी बिहेवियर दिखाता है. लेकिन जब कोई बिना गलती के भी बार-बार सॉरी कहता है, तो यह अक्सर चिंता या इमोश्नल प्रेशर का इशारा भी हो सकता है.
ऐसे लोग अक्सर हर सिचुएशन में पहले से ही खुद को जिम्मेदार मान लेते हैं और किसी भी टकराव से बचने के लिए पहले ही सॉरी बोल देते हैं. जबकि उनकी कोई गलती होती भी नहीं.
एक्सपर्ट बताते हैं कि कई बार बचपन का माहौल इस आदत की बेस बना देता है. जिससे यदि कोई बच्चा ऐसे माहौल में बड़ा होता है जहां माता-पिता का बिहेवियर अलग रहा हो, बार-बार बच्चे को डांटा जाता है या उसके इमोश्नस को समझा न जाता हो, तो वह हालात के बचने के लिए सॉरी बोलने का रास्ता सीख लेता है.
साइकोलॉजी के अनुसार हमारा दिमाग लगातार यह देखता रहता है कि आसपास का माहौल सेफ है या नहीं. जिन लोगों ने बचपन में इमोशन और टेंशन का सामना किया होता है, उनका दिमाग नॉर्मल हालात को भी खतरे की तरह देखता है.
ऐसे में व्यक्ति अनजाने में दूसरों को खुश रखने या विवाद से बचने के लिए तुरंत 'सॉरी' बोल देता है. यह एक तरह से होने वाली ऑटोमैटिक प्रोसेस बन जाती है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आप किस वजह से माफी मांग रहे हैं. क्या सही में कोई गलती हुई है या केवल असहज महसूस होने के कारण आप 'सॉरी' कह रहे हैं? अपने बिहेवियर को पहचानना चेंज लाने का पहला कदम है. जरूरत पड़ने पर थेरेपी और काउंसलिंग भी मददगार साबित हो सकती हैं.