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दुनिया भर में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. इसी कड़ी में ब्रिटेन सरकार ने इंटरनेट के खतरों से बच्चों को बचाने के लिए नए और सख्त नियमों की घोषणा की है. इन प्रस्तावों के तहत AI चैटबॉट्स, सोशल मीडिया के एडिक्टिव फीचर्स जैसे 'इनफिनिट स्क्रॉलिंग' और बच्चों को लुभाने वाले डिज़ाइनों पर नियंत्रण लगाने की तैयारी है. मुद्दा साफ है कि बच्चों के लिए इंटरनेट को एक सुरक्षित ज़ोन बनाना और टेक कंपनियों की जिम्मेदारी तय करना.
ब्रिटेन सरकार के प्रस्तावित नियमों में सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु तय करने पर विचार हो रहा है. साथ ही बच्चों के लिए खतरनाक AI चैटबॉट्स और VPN जैसे टूल्स के इस्तेमाल को सीमित करने की बात कही गई है. सरकार माता-पिता की भूमिका को भी अहम मानते हुए एक राष्ट्रीय अभियान चलाने की तैयारी में है, ताकि वे बच्चों से ऑनलाइन जोखिमों पर खुलकर बात कर सकें.
अलग-अलग देश, अलग मॉडल
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर देशों ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रास्ते चुने हैं. ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध है और नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माने का प्रावधान है. फ्रांस में न्यूनतम आयु 15 वर्ष तय की गई है, जहां इससे कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी है. चीन ने समय-सीमा और 'यूथ मोड' जैसे सख्त नियंत्रण अपनाए हैं, जबकि अमेरिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के डेटा संरक्षण पर खास कानून लागू है, हालांकि राज्यों के अपने अलग नियम भी हैं.
क्या है भारत की दिशा
भारत में फिलहाल बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कोई राष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं है, लेकिन डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के तहत नियमों को मजबूत किया जा रहा है. प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा प्रोसेस करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को माता-पिता की सहमति लेनी होगी.
गोवा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य ऑस्ट्रेलिया के मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में इस विषय पर एक विशेष टास्क फोर्स भी काम कर रही है. मद्रास हाई कोर्ट ने भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उम्र आधारित प्रतिबंधों पर विचार करने का सुझाव दिया है.
सुरक्षा बनाम अधिकार, संतुलन की चुनौती
भारत में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर बहस अभी जारी है. एक ओर ऑनलाइन शोषण, साइबर बुलिंग और एडिक्शन से बच्चों को बचाना जरूरी है, तो दूसरी ओर निजता और डिजिटल अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही अहम है. फिलहाल देश सहमति-आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रुझानों को देखते हुए भविष्य में उम्र की सीमा और प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही को लेकर और सख्त कदम उठाए जा सकते हैं.