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इतिहास का पहला SMS... पहली बार कंप्यूटर से मोबाइल पर भेजा गया संदेश, जानें कैसे विस्तार हुआ टेक्सट मैसेज की दुनिया का

SMS का विचार 1980 के दशक में आया और 3 दिसंबर 1992 को इंजीनियर नील पैपवर्थ ने पहला मैसेज 'Merry Christmas' भेजा था. शुरुआत में 160 कैरेक्टर की सीमा के साथ शुरू हुई यह तकनीक 90 के दशक के अंत में युवाओं के बीच पसंदीदा ऑप्शन बनती चली गई.

मैसेज का विस्तार मैसेज का विस्तार

'कहां हो?', 'खाना खा लिया?' या 'ओके' जैसे छोटे-छोटे मैसेज आज के दौर में हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. हम सोचते भी नहीं हैं मगर यही बदलाव आज हमारी जिंदगी का एक बड़ा बदलाव का हिस्सा बन चुका है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि टेक्स्ट मैसेज यानी SMS की शुरुआत आखिर हुई कैसे? जिस मैसेज के बिना आज हम रह नहीं सकते, वह कभी सिर्फ एक छोटा-सा तकनीकी प्रयोग था, जिसका मकसद लोगों की जिंदगी को आसान बनाना था. धीरे-धीरे यही टेक्नोलॉजी दुनिया भर के लोगों को जोड़ने का सबसे आसान जरिया बन गई. 

हालांकि पहले भी लोग संदेश भेजने का काम करते थे, लेकिन वह प्रोसेस काफी मुश्किलों से भरा होता था. कहते हैं न कि आवश्यकता तकनीक की जननी होती थी. आइए समझते हैं वह शुरूआत, जहां से हमारे अस्तित्व में आई दुनिया को बदल देने वाली ये मैसेजिंग टेक्नोलॉजी.

1980 के दशक में पड़ी थी नींव
टेक्स्ट मैसेज का विचार 1980 के दशक में सामने आया, जब इंजीनियर यह तरीका खोज रहे थे कि मोबाइल नेटवर्क के जरिए छोटी जानकारी कैसे भेजी जा सकती है. उस समय मोबाइल फोन सिर्फ कॉल करने के लिए इस्तेमाल होते थे, इसलिए लिखकर बात करना लोगों को किसी नई चीज जैसा लगता था. 1984 में इस तकनीक पर गंभीर काम शुरू हुआ और यह तय किया गया कि एक मैसेज 160 कैरेक्टर तक का होगा, जिसे लोग किसी को मैसेज भेज सकेंगे. यही पहल बाद में SMS की पहचान बन गई.

पहला मैसेज जिसने बदल दी दुनिया
इंजीनियर 3 दिसंबर 1992 को सफल हुए, जब इतिहास का पहला टेक्स्ट मैसेज भेजा गया. इंजीनियर नील पैपवर्थ ने कंप्यूटर से एक मोबाइल फोन पर 'Merry Christmas' लिखकर संदेश भेजा था. यह छोटा-सा मैसेज देखने में भले सामान्य लगे, लेकिन यहीं से एक नई डिजिटल दुनिया की शुरुआत हुई. खास बात यह थी कि उस समय फोन से जवाब देना भी आसान नहीं था.

शुरुआत में लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया
90 के दशक के शुरुआती सालों में SMS फीचर मौजूद तो था, लेकिन लोग इसका इस्तेमाल बहुत कम करते थे. मोबाइल फोन महंगे थे और कई लोगों को यह तक पता नहीं था कि उनके फोन में मैसेज भेजने की सुविधा है. फिर नोकिया फोन की कंपनी ने ऐसे फोन बाजार में उतारे जिनसे लोग खुद मैसेज लिख और भेज सकते थे. यहीं से धीरे-धीरे टेक्स्टिंग लोगों की जिंदगी में जगह बनाने लगी.

युवाओं ने बदला बातचीत का तरीका
90 के आखिर और 2000 के शुरुआती सालों में टेक्स्ट मैसेज का चलन तेजी से बढ़ा. खासकर युवाओं ने इसे खूब अपनाया क्योंकि कॉल करने के मुकाबले मैसेज सस्ता पड़ता था. इसी दौर में 'LOL', 'BRB' और छोटे शब्दों का ट्रेंड शुरू हुआ. लोग कम शब्दों में ज्यादा बात कहना सीख गए.

स्मार्टफोन आए तो बदल गया सब कुछ
2007 के बाद स्मार्टफोन का दौर शुरू हुआ और टेक्स्टिंग का तरीका भी बदल गया. अब सिर्फ SMS नहीं, बल्कि फोटो, वीडियो और वॉइस मैसेज भेजने वाले ऐप्स आ गए. हालांकि इतने बदलावों के बावजूद SMS पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. बैंक अलर्ट, OTP, सरकारी सूचना और जरूरी अपडेट आज भी ज्यादातर SMS के जरिए ही आते हैं.

आज भी क्यों खास है टेक्स्ट मैसेज?
भले ही दुनिया WhatsApp और दूसरे ऐप्स की तरफ बढ़ गई हो, लेकिन टेक्स्ट मैसेज की अहमियत अभी भी बरकरार है. इंटरनेट कमजोर हो या स्मार्टफोन न हो, एक साधारण मैसेज अब भी लोगों को जोड़ देता है. यही वजह है कि टेक्स्ट मैसेज का सफर आज भी जारी है, बस तरीका समय के साथ बदलता गया.

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