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Internet safety for children: हर दिन बढ़ रहा इंटरनेट पर बच्चों के लिए खतरा! जानें कैसे रखें बच्चों को महफूज 

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने बच्चों को "वर्चुअल टच" के बारे में सिखाने के महत्व पर जोर दिया है. इससे हम बच्चों को ऑनलाइन इंटरैक्शन को सुरक्षित रूप से नेविगेट करने और साइबरस्पेस में संभावित जोखिमों को पहचानना सिखा सकते हैं.

Internet safety for children (Photo: Unsplash) Internet safety for children (Photo: Unsplash)
हाइलाइट्स
  • बच्चों को वर्चुअल टच सिखाना जरूरी 

  • बच्चों को रख सकते हैं सुरक्षित  

बच्चों को इंटरनेट के संभावित खतरों से बचाना काफी मुश्किल काम है. इसके लिए माता-पिता, शिक्षकों, पॉलिसी मेकर और खुद बच्चों को शामिल करते हुए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत होती है. जबकि कानून और नियम बनाने के लिए घर और स्कूलों में खुली बातचीत जरूरी है. बच्चों की ऑनलाइन सेफ्टी में एक सबसे बड़ी चुनौती टेक्नोलॉजी का तेजी से बदलना है. आज ज्यादातर बच्चे इंटरनेट चलाते हैं. इसका मतलब है कि उन्हें कम उम्र से ही साइबरबुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, गलत कंटेंट का एक्सेस मिल जाता है. 

बच्चों को रख सकते हैं सुरक्षित  

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करना के लिए संविधान में POCSO अधिनियम दिया गया है. साथ ही डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन  (DPDP) अधिनियम जैसे कानूनों का उद्देश्य इनमें से कुछ चिंताओं को दूर करना है. लेकिन ये बच्चों को पूरी तरह से साइबर खतरों से दूर नहीं रख सकते हैं. इसलिए माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों को सुरक्षित तरीके इंटरनेट का उपयोग करने के बारे में शिक्षित करना चाहिए. साथ ही उन्हें ऑनलाइन निर्णय लेने के लिए सशक्त बनाने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए. 

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बच्चों को वर्चुअल टच सिखाना जरूरी 

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने बच्चों को "वर्चुअल टच" के बारे में सिखाने के महत्व पर जोर दिया है. इससे हम बच्चों को ऑनलाइन इंटरैक्शन को सुरक्षित रूप से नेविगेट करने और साइबरस्पेस में संभावित जोखिमों को पहचानना  सिखा सकते हैं. इसमें बच्चों को ऑनलाइन बेहेवियर के बारे में पढ़ाना, प्राइवेसी सेटिंग्स को समझना और हिंसक व्यवहार के चेतावनी संकेतों को पहचानना शामिल है.

माता-पिता और शिक्षक बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कई कदम उठा सकते हैं-

1. खुला संचार: बच्चों और वयस्कों के बीच उनके ऑनलाइन अनुभवों के बारे में खुले संवाद को प्रोत्साहित करें. बच्चों के लिए एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि वे बिना किसी के डर के प्रश्न पूछ सकें और अपनी चिंता जाता सकें. 

2. शिक्षा: बच्चों को साइबरबुलिंग, ऑनलाइन शिकारियों और अनुचित सामग्री के संपर्क सहित इंटरनेट के संभावित जोखिमों के बारे में सिखाएं. इन जोखिमों को कैसे पहचाना जाए और उचित रूप से प्रतिक्रिया कैसे दी जाए, इस पर मार्गदर्शन करें.     

3. सीमाएं निर्धारित करें: इंटरनेट के उपयोग के लिए स्पष्ट नियम और सीमाएं स्थापित करें, जिसमें कुछ वेबसाइटों या प्लेटफॉर्म तक पहुंचने के लिए उचित समय सीमा और दिशानिर्देश शामिल हों. बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें और उनके ऑनलाइन दोस्तों और बातचीत से अवगत रहें. 

4. गोपनीयता सेटिंग्स: बच्चों को सिखाएं कि अपनी निजी जानकारी को अजनबियों के साथ साझा होने से बचाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और दूसरे ऑनलाइन अकाउंट पर प्राइवेसी सेटिंग्स को कैसे मैनेज.

5. ऑनलाइन गतिविधि देखें: बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी करें, विशेष रूप से छोटे बच्चों की. साथ ही वे जिस भी वेबसाइटों को देख रहे हैं उनको लेकर अवगत रहें. पैरेंटल कंट्रोल लगाकर रखें.